सियासत में उम्र और शिक्षा की कसौटी कब तय होगी

लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)

देश में इस समय वन नेशन वन इलेक्शन पर चर्चा गर्म है। चुनाव एक साथ कराने का विचार चाहे कितना ही आकर्षक क्यों न हो, लेकिन इसके साथ ही राजनीति से जुड़ा एक और अहम मुद्दा सामने आता है। वह मुद्दा है चुनाव लडऩे के लिए उम्र और शिक्षा की सीमा का। वर्तमान में भारत में चुनाव लडऩे की न्यूनतम आयु 25 वर्ष निर्धारित है, लेकिन अधिकतम आयु की कोई सीमा तय नहीं है। यही नहीं, राजनीति में प्रवेश करने वालों के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता भी अनिवार्य नहीं है। यह स्थिति अपने आप में असंतुलन और सवाल खड़े करती है कि जब सरकारी नौकरी से लेकर हर क्षेत्र में योग्यता और उम्र का निर्धारण है तो राजनीति इससे अछूती क्यों रहे?
भारत में हर सरकारी नौकरी के लिए स्पष्ट शर्तें तय की जाती हैं। कोई भी व्यक्ति तभी नौकरी के लिए योग्य होता है जब वह निर्धारित शैक्षणिक योग्यता पूरी करता है। न केवल यह, बल्कि नौकरी शुरू करने और रिटायरमेंट की भी आयु सीमा तय होती है। यह व्यवस्था इसलिए है ताकि एक व्यक्ति पूरे उत्साह और क्षमता के साथ कार्य कर सके और समय रहते नई पीढ़ी को भी अवसर मिले। लेकिन राजनीति में न तो शिक्षा का बंधन है और न ही ऊपरी उम्र की कोई रेखा। यही कारण है कि एक ओर जहां 25 साल का युवा राजनीति में प्रवेश कर सकता है, वहीं दूसरी ओर 85-90 वर्ष का नेता भी सर्वोच्च पद पर काबिज हो सकता है।

राजनीति में ऊपरी आयु सीमा तय करना बेहद जरूरी हो गया है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शारीरिक और मानसिक ऊर्जा घटती जाती है। शासन और प्रशासन चलाना केवल भाषण देने तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें लगातार निर्णय लेने, नई नीतियां बनाने और जनता से संवाद बनाए रखने की क्षमता चाहिए। एक अधिक उम्रदराज नेता यह सब उसी दक्षता के साथ कर पाएगा, इसमें संदेह बना रहता है। दूसरी ओर, यदि एक ऊपरी उम्र सीमा तय हो जाए तो राजनीति में नई सोच, नई ऊर्जा और नए नेतृत्व के लिए रास्ता स्वत: खुल जाएगा। इससे लोकतंत्र अधिक जीवंत और मजबूत बन सकेगा।
लोकतंत्र में नेता केवल जनप्रतिनिधि नहीं होते बल्कि नीति निर्धारक भी होते हैं। उनके फैसले आने वाली पीढिय़ों का भविष्य तय करते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बिना शिक्षा के कोई व्यक्ति देश के विकास की सही दिशा तय कर सकता है? शिक्षा केवल डिग्री नहीं बल्कि सोचने, समझने और विश्लेषण करने की क्षमता देती है। यदि नेता शिक्षित होगा तो वह आंकड़ों और तथ्यों को बेहतर समझेगा और उसी आधार पर निर्णय ले सकेगा। दूसरी ओर, यदि नेता कम शिक्षित है तो उसके निर्णय कई बार अधूरे ज्ञान पर आधारित हो सकते हैं।

बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव का नाम हमेशा चर्चा में रहता है। उनकी शिक्षा को लेकर बार-बार सवाल उठते हैं। आलोचकों का कहना है कि यदि तेजस्वी यादव जैसे नेता मुख्यमंत्री पद पर आते हैं तो क्या उनकी शिक्षा की कमी शासन की कार्यप्रणाली में बाधा बनेगी? यह केवल एक व्यक्ति का सवाल नहीं है बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चिंतन का विषय है। यदि किसी राज्य का प्रमुख नीति निर्धारक ही शिक्षा से वंचित है तो वह शिक्षा नीति, रोजगार नीति या आर्थिक सुधारों को कितनी गहराई से समझ पाएगा, यह सोचने वाली बात है। हर मतदाता चाहता है कि उसका नेता उसके भविष्य को बेहतर बनाए। यदि नेता खुद पढ़ा-लिखा न हो तो क्या वह शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और तकनीक जैसे जटिल विषयों पर सही निर्णय ले पाएगा? क्या वह आधुनिक चुनौतियों का समाधान वैज्ञानिक और तर्कसंगत तरीके से कर पाएगा? शिक्षा केवल व्यक्तिगत विकास तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक नेता की कार्यशैली और दृष्टिकोण को भी परिभाषित करती है।

विश्व के कई देशों ने राजनीति में शिक्षा और उम्र को लेकर स्पष्ट मानदंड बनाए हैं। कई जगहों पर संसद या राष्ट्रपति पद के लिए उच्च शिक्षा अनिवार्य है। कहीं-कहीं पर राजनीति में ऊपरी आयु सीमा भी तय की गई है। इसका उद्देश्य यह है कि सत्ता में आने वाले लोग न केवल ऊर्जावान हों बल्कि पढ़े-लिखे और समझदार भी हों। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में भी ऐसे नियमों की आवश्यकता है ताकि राजनीति को केवल वंशवाद या अनुभव का खेल न माना जाए, बल्कि इसे योग्यता और जिम्मेदारी का क्षेत्र समझा जाए। आज भारत के लोकतंत्र को और मजबूत बनाने के लिए राजनीति में सुधार अनिवार्य हो गया है। यदि राजनीति को पारदर्शी और प्रभावी बनाना है तो नेताओं की आयु सीमा और शिक्षा की न्यूनतम योग्यता तय करनी होगी। इससे न केवल नई पीढ़ी को अवसर मिलेगा बल्कि जनता को भी यह भरोसा होगा कि जिनके हाथ में देश की बागडोर है वे सक्षम और योग्य हैं। राजनीति में आने वालों को केवल वोट मांगने और भाषण देने तक सीमित न रखकर उन्हें एक प्रशिक्षित और जिम्मेदार नेतृत्व के रूप में तैयार करना जरूरी है। राजनीति का मूल स्वरूप जनसेवा है। लेकिन यह तभी संभव है जब नेता जनता की समस्याओं को गहराई से समझें और उनका समाधान ढूंढने में सक्षम हों। यदि नेता ऊर्जा और शिक्षा दोनों से संपन्न होगा तो उसकी कार्यशैली में नयापन और पारदर्शिता होगी। वह केवल सत्ता की राजनीति नहीं करेगा बल्कि समाज के उत्थान और विकास के लिए काम करेगा।