बदलता वक्त : जम्मू-कश्मीर में परिवर्तन की बयार

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में विधान सभा चुनाव कराने के लिए कवायद तेज हो गई है। अगले साल विस चुनाव संपन्न होने की उम्मीद है। इसके पहले नए सिरे से परिसीमन की प्रक्रिया चल रही है। परिसीमन का काम मार्च-2020 तक पूर्ण हो जाएगा। परिसीमन के उपरांत विधान सभा की 7 सीटें बढ़ जाएंगी। फिलहाल विस की कुल 83 सीटें हैं। केंद्र शासित राज्य गठित होने से पहले जम्मू-कश्मीर में विस की 87 सीटें थीं। लद्दाख के अलग होने के बाद 4 सीटें कम हो गई थीं। केंद्र शासित राज्य लद्दाख के हिस्से में यह 4 सीटें आ चुकी हैं। जम्मू-कश्मीर में विधान सभा चुनाव से पहले परिसीमन की जरूरत महसूस की गई है। इसके मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कुछ दिन पहले दिल्ली में सर्वदलीय बैठक आयोजित की गई थी। इस उच्चस्तरीय बैठक में जम्मू-कश्मीर के 8 राजनीतिक दलों के 16 प्रतिनिधियों ने शिरकत की थी। केंद्र सरकार के ताजा कदम से पीडीपी प्रमुख एवं पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती संतुष्ट नहीं हैं। वह चाहती हैं कि पहले जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा वापस लौटाया जाए। इसके बाद विस चुनाव कराए जाएं। हालांकि उनकी यह मंशा पूरी होने की संभावना नहीं है। जम्मू-कश्मीर में परिसीमन आयोग की टीम ने अपना काम शुरू कर दिया है। परिसीमन आयोग की टीम विभिन्न राजनीतिक एवं सामाजिक संगठनों के 800 सदस्यों से मुलाकात कर चुकी है। इन सदस्यों से विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा की गई है। उन्हें अवगत कराया गया है कि जम्मू-कश्मीर में पहले 12 जिले आते थे। इनकी संख्या बढ़कर अब 20 हो गई है। ऐसे में नए सिरे से परिसीमन की आवश्यकता पड़ी है। इन संगठनों के अधिकांश सदस्यों ने परिसीमन प्रक्रिया पर संतोष जाहिर किया है। परिसीमन का काम 2011 की जनगणना पर आधारित होगा। इसमें भौगोलिक स्थितियों और नागरिकों की सुविधा का भी ख्याल रखा जाएगा। पिछले परिसीमन में भौगोलिक परिस्थितियों का ध्यान नहीं रखा गया था। केंद्र सरकार ने 5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष राज्य का दर्जा समाप्त कर दिया था। इसके चलते अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्राविधान हटा दिए गए। इसके बाद से वहां की कमान राज्यपाल के हाथों में है। वर्तमान में मनोज सिन्हा इस पद पर विराजमान हैं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से वहां के विभिन्न राजनीतिक दल केंद्र सरकार के खिलाफ लामबंद हो गए थे। इन दलों ने एक मंच पर आकर गुपकार गठबंधन गठित किया। इस गठबंधन के बैनर तले वह समय-समय पर मीटिंग करते रहते हैं। इस राज्य में पिछले 2 साल में परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया है। यह देखकर केंद्र सरकार वहां जल्द से जल्द विधान सभा चुनाव करा लेना चाहती है। पाकिस्तान को यदि छोड़ दें तो जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत को कोई परेशानी नहीं है। पाकिस्तान बेवजह कश्मीर का राग अलापना नहीं छोड़ रहा है। इस कारण दोनों देशों के बीच लंबे समय से वार्ता प्रक्रिया रूकी पड़ी है। पाकिस्तान की तरफ से हाल ही में बयान आया था कि जब तब कश्मीर का मुद्दा निपट नहीं जाता तब तक वह भारत के साथ वार्ता नहीं करेगा। जबकि भारत सरकार का रूख साफ है। सरकार का कहना है कि पाकिस्तान के साथ यदि भविष्य में वार्ता होगी तो वह पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर होगी। जम्मू-कश्मीर पर वार्ता का कोई सवाल नहीं उठता। पाकिस्तान अब इस्लामिक देशों के संगठन के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश में लगा है। इस सिलसिले में कुछ दिन पहले सऊदी अरब में भारत के राजदूत से इस्मालिक देशों के संगठन के प्रतिनिधि ने मुलाकात की थी। उस दौरान जम्मू-कश्मीर में एक प्रतिनिधिमंडल भेजने की मंशा जाहिर की गई थी। उधर, भारत का स्पष्ट मत है कि जम्मू-कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है। इसमें किसी भी देश को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। जम्मू-कश्मीर में जब-जब अमन-चैन और खुशहाली का दौर लौटने लगता है, तब-तब पाकिस्तान के पेट में दर्द होता है। इस राज्य में परिसीमन और विधान सभा चुनाव की तैयारियां होती देख यह पड़ोसी मूल्क एक बार फिर बेचैन नजर आ रहा है। वह घाटी में माहौल खराब करने की भरसक कोशिश में जुटा है। पाकिस्तान के नापाक प्रयासों को जम्मू-कश्मीर के कुछ नेताओं और खासकर कांग्रेस के कारण बल मिलता है। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती बार-बार मोदी सरकार से पाकिस्तान के साथ वार्ता करने की मांग करती रहती हैं। जबकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह भी अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग कर एक तरह से पाक के सुर में सुर मिलता दिखाई देते हैं। दिग्विजय सिंह यह तक कह चुके हैं कि यदि कांग्रेस पुन: सत्ता में लौटती है तो जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा बहाल कर दिया जाएगा। इस बयान के कारण उन्हें काफी आलोचना का शिकार भी होना पड़ा है, मगर उन पर मानो कोई फर्क नहीं पड़ता। बहरहाल जम्मू-कश्मीर में नए परिसीमन के बाद विधान सभा चुनाव कराए जाने पर वहां की सियासी तस्वीर बदल सकती है। यह चिंता गुपकार गठबंधन के नेताओं को भी परेशान कर रही है। वोट बैंक खिसकने के डर से इन नेताओं की रातों की नींद उड़ी हुई है। जम्मू-कश्मीर की सत्ता में लौटने के लिए यह नेता उतावले भी हैं। वैसे उन्हें यह मालूम है कि भविष्य की राजनीति में चुनौतियां बढ़नी तय हैं। इसलिए इन नेताओं को मजबूरी में एक मंच पर आना पड़ा है। जम्मू-कश्मीर में भाजपा को रोकने के लिए गुपकार गठबंधन कोई बड़ा कदम उठाने से कभी पीछे नहीं हटेगा। बेशक उन्हें एकजुट होकर विधान सभा चुनाव में उतना क्यूं न पड़े। इस राज्य में भविष्य की सियासी तस्वीर बेहद दिलचस्प होगी। पत्थरबाजी का दौर थमने, आतंकी घटनाओं में कमी आने, रोज-रोज के बंद की परंपरा समाप्त होने से वहां की अवाम को भी राहत मिली है। जम्मू-कश्मीर के विकास और शांति व्यवस्था को पटरी पर लाने की कवायद के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। इससे केंद्र सरकार को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी।