कमांडो सेंटर : उत्तर प्रदेश सरकार का अह्म कदम

अफगानिस्तान में तालिबान की बर्बरता को देखकर आज समूची दुनिया चिंतित है। हालात बद से बदतर होने के बावजूद शक्तिशाली मुल्क भी तमाशबीनों की भूमिका में हैं। ऐसे में तालिबान को ज्यादती करने की खुली छूट मिल गई है। यह स्थिति बेहद विनाशकारी है। भविष्य में इसके खतरनाक परिणाम सामने आने की प्रबल संभावना है। अफगानिस्तान का मौजूदा परिदृश्य इंसानियत को शर्मसार कर रहा है। वहां आम नागरिकों को खून के आंसू रोने पड़ रहे हैं। तालिबान के खौफनाक मंसूबों ने भारत को सतर्क कर दिया है। इसके मद्देनजर सुरक्षा रणनीति पर काम शुरू हो गया है।

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। इसके तहत देवबंद में एटीएस का कमांडो सेंटर खोला जाएगा। इस सेंटर में डेढ़ दर्जन तेज-तर्रार एटीएस अधिकारियों की तैनाती की जाएगी। कमांडो सेंटर का काम युद्धस्तर पर आरंभ कर दिया गया है। इसके लिए करीब 2 हजार वर्ग मीटर भूखंड आवंटित की गई है। जनपद सहारनपुर में देवबंद आता है। देवबंद को इस्लामी शिक्षा का बड़ा केंद्र माना जाता है। एटीएस की टीम ने 2 साल पहले आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के 2 सदस्यों को देवबंद से गिरफ्तार किया था। आतंकियों की गिरफ्तारी से देवबंद अचानक सुर्खियों में आ गया था। इसके अलावा बांग्लादेशी और आईएसआई एजेंट भी देवबंद से दबोचे जा चुके हैं।

काफी संवेदनशील क्षेत्र होने की वजह से देवबंद में एटीएस कमांडो सेंटर खोलने की जरूरत महसूस की गई है। उप्र की राजधानी लखनऊ और नोएडा में भी कमांडो सेंटर खोलने की कवायद जारी है। लखनऊ में अमौसी एयरपोर्ट के पास और नोएडा में जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नजदीक यह सेंटर स्थापित होना है। देश का सबसे बड़ा प्रांत उत्तर प्रदेश हमेशा आतंकियों की पसंदीदा जगह रहा है। कुछ जनपदों में आतंकियों की सक्रियता का खुलासा समय-समय पर होता रहा है। कुख्यात आतंकी अब्दुल करीम उर्फ टूंडा की जन्मस्थली भी यूपी है। यह आतंकी लंबे समय से जनपद गाजियाबाद की जेल में बंद है। हापुड़ जनपद के पिलखुवा का रहने वाला टूंडा एक समय में हिंदुस्तान से भाग कर पाकिस्तान पहुंच गया था। पाकिस्तान में कई साल तक वह दहशतगर्दों के साथ रहा। कुछ साल पहले भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने नेपाल से टूंडा को दबोच लिया था।

उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, मेरठ इत्यादि में आतंकियों की आवाजाही की खुफिया खबरें मिलती रही हैं। नोएडा, लखनऊ और सहारनपुर में एटीएस कमांडो सेंटर खुलने पर विषम परिस्थितियों में आतंकियों से निपटना संभव हो सकेगा। देवबंद को लेकर खुफिया एजेंसियां अक्सर सतर्क रहती हैं। यह जगजाहिर तथ्य है कि विभिन्न आतंकी संगठन गरीब परिवारों के सीधे-साधे युवाओं का ब्रेन वॉश कर उन्हें आतंक के रास्ते पर उतारते हैं। खासकर पाकिस्तान में यह खेल कई वर्षों से बदस्तूर चल रहा है।

पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में आतंकी शिविर संचालित होते हैं। जहां युवाओं को आतंक की ट्रेनिंग देकर दूसरे देशों में कत्लेआम मचाने को भेजा जाता है। तालिबान के जिस खतरनाक और ताकतवर रूप को आज दुनिया देख रही है, उसे इस स्थिति में पहुंचाने में अमेरिका और पाकिस्तान का बड़ा हाथ रहा है। अमेरिका से पहले रूस ने अफगानिस्तान में जंग शुरू की थी। उस दौर में अमेरिका ने रूस के मिशन को फेल करने के लिए आम अफगानी के हाथों में हथियार थमाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बुरी तरह पराजित होने के बाद रूस को भी आनन-फानन में अफगानिस्तान को छोड़कर भागना पड़ा था। बाद में अमेरिका की मदद से तैयार हथियारबंद गिरोह ने मिलकर तालिबान का गठन किया था। तालिबान के सख्त कानूनों के डर से आम नागरिक विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं।

अफगानिस्तान में 20 साल तक जंग लड़ने के बाद अब अमेरिका भी वहां से निकल भागा है। इसका परिणाम सामने आ गया है। तालिबान को लेकर भारत अभी कोई ठोस स्टैंड नहीं ले पाया है। तालिबान के साथ संबंध सामान्य न होने पर भारत को खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। खुफिया एजेंसियां यह आशंका जाहिर कर चुकी हैं कि आने वाले समय में तालिबान के लड़ाके भारत का रूख कर सकते हैं। चूंकि चीन और पाकिस्तान ने तालिबान के साथ खुद को जोड़ लिया है। सबसे बड़ा खतरा जम्मू-कश्मीर को लेकर है।

जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाए जाने के बाद तालिबान ने तटस्थ रूख अपनाया था। इस संगठन ने तब कहा था कि वह भारत-पाकिस्तान के आपसी विवाद और जम्मू-कश्मीर के मामले में फंसना नहीं चाहता है। जम्मू-कश्मीर में भारत क्या करता है, इससे तालिबान को कोई फर्क नहीं पड़ता, मगर जानकारों का मानना है कि तालिबान पर भरोसा नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान के इशारे पर वह भारत की परेशानी को बढ़ा सकता है। अलबत्ता नई दिल्ली को अभी से सभी आवश्यक तैयारियां आरंभ कर देनी चाहिए। समय हाथ से निकलने पर कुछ हासिल नहीं हो पाएगा। देश की सीमाओं की सुरक्षा बढ़ाने के साथ-साथ खुफिया एजेंसियों को सतर्क रहना होगा।

अफगानिस्तान में दिन-प्रतिदिन बदलते घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रखनी होगी। भारत सरकार को जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। इसके अलावा देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने पर अधिक ध्यान दिया जाए ताकि घर के भीतर किसी भी चुनौती का डटकर सामना किया जा सके। खासकर जम्मू-कश्मीर को बाहरी आतंकियों से महफूज रखने को नए सिरे से रणनीति बनानी होगी। चूंकि अफगानिस्तान में सक्रिय पाक समर्थित आतंकी भविष्य में कश्मीर की तरफ बढ़ने की मंशा रख सकते हैं। देश में आतंकवाद से निपटने के लिए नागरिकों को जागरूक करना जरूरी जान पड़ता है। सुरक्षा के प्रति नागरिकों का सतर्क रहना बेहद आवश्यक है।