शासनादेश की अनदेखी, नियमों से मोड़ लिया मुंह
लखनऊ। उत्तर प्रदेश शासन के नगर विकास अनुभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। नगर विकास विभाग द्वारा इन दिनों व्यापक स्तर पर अधिकारियों एवं कर्मचारियों के ट्रांसफर किए गए हैं। आरोप है कि शासनादेश के विपरित जाकर यह रद्दोबदल की गई है। इसके चलते विवाद उभर आया है। नगर विकास विभाग के शीर्ष अधिकारियोंं को अब आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है।
नगर विकास विभाग में किए गए ट्रांसफर अब चर्चाओं के केंद्र में आ गए हैं। आरोप है कि ट्रांसफर में शासनादेश एवं नियम कानून को ताक पर रख दिया गया है। व्यापक पैमाने पर मनमाने तरीके से ट्रांसफर किए गए हैं। ज्यादातर ट्रांसफर के पीछे तर्कहीन कारण बताए गए हैं। ऐसे में नगर विकास विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठना लाजमी बात है। सूत्रों का कहना है कि अधिकारियों एवं कर्मचारियों के ट्रांसफर में कई मामले ऐसे भी संज्ञान में आए हैं, जिसमें विधायकों के पत्र का दुरुपयोग किया गया है या फिर धोखे में रखकर उनसे शिकायत पत्र लिखवा लिए गए हैं। जिस क्षेत्र के अधिकारियों एवं कर्मचारियों से विधायक का कोई लेना-देना नहीं है, उन क्षेत्रों के अधिकारी एवं कर्मचारी के ट्रांसफर के लिए भी विधायकों के शिकायती पत्र का इस्तेमाल किया गया है। शिकायती पत्रों के निस्तारण के संबंध में शासनादेश और गाइड लाइन भी पहले से जारी है। लेकिन शासनादेश के इस गाइडलाइन का भी पालन नहीं किया गया।
नियम है कि शासनादेश के अनुरूप ही किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ प्राप्त शिकायतों का निपटारा किया जाता है, मगर इस बार शासनादेश को मानो नजरअंदाज कर दिया गया है। शिकायतों के निस्तारण को लेकर पूर्व में शासन द्वारा जारी एक शासनादेश के मुताबिक समूह ग और घ श्रेणी के सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कोई शिकायत प्राप्त होती है तो उसके निस्तारण को लेकर जरूरी प्रक्रिया का अनुपालन कराया जाना बेहद जरूरी है। शासनादेश के मुताबिक यदि किसी विशिष्टजन की तरफ से शिकायत की गई है तो इस मामले में शिकायत कर्ता से पत्र के जरिए यह जानकारी अवश्य प्राप्त की जाए कि क्या शिकायत पत्र पर उन्हीं के हस्ताक्षर हैं अथवा कहीं उनके हस्ताक्षर का दुरुपयोग तो नहीं किया गया है। इसके अलावा यह भी जांच करना जरूरी है कि शिकायत तथ्यों के आधार पर हो और तथ्य आरोपों की पुष्टि करते हों। शासनादेश में कहा गया है कि शिकायत कर्ता से शपथ पत्र और शिकायत की बाबत समुचित सबूत एवं साक्ष्य भी उपलब्ध कराया जाए। समूह एवं साक्ष्य मिलने के बाद ही कैसी शिकायत पत्र पर आगे की कार्रवाई की जाए। आरोप है कि नगर विकास विभाग ने ट्रांसफर करने से पहले शासनादेश को तवज्जो देने की जहमत नहीं उठाई। ट्रांसफर में इस तरह की गड़बड़ी करने के पीछे आखिर किसकी और क्या मंशा रही, यह भी चर्चाओं में है। नगर विकास विभाग में हुए ट्रांसफर की यदि जांच होती है तो संभव है कि किसी बड़े खेल का भांडा फूट सकता है।
















