CPEC Project – इंजीनियरों के हाथ में हथियार

चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC Project) प्रोजेक्ट चीन के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। पाकिस्तान में जबरदस्त विरोध के बावजूद यह प्रोजेक्ट रूका नहीं है। डर और दहशत के साए में चीन के इंजीनियरों को काम करना पड़ रहा है। असुरक्षा की भावना से घिरे इंजीनियरों ने अब औजारों के साथ हथियार भी उठा लिए हैं। कार्यस्थल पर वह कंधे पर हथियार टांग कर काम करने को मजबूर हैं।

चीन के कर्मचारियों की हथियारों के साथ काम किए जाने की फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद चर्चाएं शुरू हो गई हैं। इन तस्वीरों से पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था का अंदाजा लगाना मुमकिन है। CPEC Project चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का ड्रीम प्रोजेक्ट है। इस प्रोजेक्ट के जरिए सड़क मार्ग से व्यापक स्तर पर कारोबार करने की प्लानिंग की गई है। CPEC Project से चीन ने विभिन्न देशों को जोड़ा है। एक प्रकार से ड्रैगन का मकसद विश्व के बाजार पर अपनी पकड़ मजबूत करना है। पाकिस्तान में इस प्रोजेक्ट पर चीन को पानी की भांति पैसा बहाना पड़ रहा है।

पाकिस्तान में CPEC Project पर हमेशा संकट के बादल मंडराते रहे हैं, मगर चीन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है। गत 14 जुलाई को चीनी इंजीनियर की बस पर भीषण हमला कर दिया गया था। बस में सवार होकर इंजीनियरों का दल कार्यस्थल की तरफ जा रहा था। हमले में 13 नागरिकों की मौत हो गई थी। हमले के पीछे ब्लूचिस्तान लिबरेशन आमी का हाथ होने की आशंका जाहिर की गई थी। ब्लूचिस्तान लिबरेशन आर्मी पाकिस्तान में चीन के बढ़ते दखल से कतई संतुष्ट नहीं है। दरअसल पाकिस्तान ने ब्लूचिस्तान की धरती पर CPEC Project को मंजूरी देने से पहले स्थानीय नेताओं के साथ किसी प्रकार की बातचीत नहीं की थी। चीन इंजीनियरों पर हमले के बाद बीजिंग ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की थी।

बीजिंग ने प्रधानमंत्री इमरान खान को इस मामले में गंभीरता से जांच कराने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की हिदायत दी थी। बाद में चीन ने पाकिस्तान को आइना दिखाकर अपना जांच दल घटनास्थल पर भेजा। चीनी जांच दल के मौके पर जाने के पीछे का कारण पाकिस्तान के प्रति बीजिंग की विश्वसनीयता में कमी को दर्शाता है। इसके पहले विगत 5 अक्तूबर 2020 को सबसे घातक हमला देखने को मिला था। जब पाकिस्तान के 14 सुरक्षा कर्मचारियों को बस से उतार कर मौत के घाट उतार दिया गया था। इस वारदात से समूचे पाकिस्तान में हंगामा मच गया था।

CPEC Project की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान की तरफ हरसंभव कदम उठाए गए हैं, मगर सुरक्षा में अक्सर चूक होने का नतीजा सामने आता रहता है। पाकिस्तान में कार्यरत अपने कर्मचारियों की सुरक्षा के लिहाज से चीन बेहद गंभीर रहा है। बीजिंग ने 2 स्पेशल सिक्योरिटी डिवीजन बनाने हेतु मोटी रकम खर्च की है। प्रत्येक डिवीजन में 15 हजार जवान तैनात हैं। हालांकि पाकिस्तान आर्मी ने इन डिवीजन को बनाए रखने को और अधिक रकम की डिमांड की थी। चीन ने इस डिमांड को भी पूरा किया था। इसके बाद भी चीनी कर्मचारियों की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत चीनी कर्मचारियों को माकूल सुरक्षा दी गई है। इंजीनियर और कर्मचारी हमेशा सशस्त्र बलों से घिरे रहते हैं। फिर भी उन पर हमले नहीं रूक पाए हैं। परिणाम स्वरूप चीनी इंजीनियरों को औजारों के साथ हथियार उठाने को विवश होना पड़ा है। प्रत्येक इंजीनियर को एक-47 दी गई है ताकि वह अपनी हिफाजत खुद कर सकें।

पाकिस्तान में जब निर्माणाधीन CPEC Project पर आए दिन आतंकी हमले हो रहे हैं तो भविष्य में क्या स्थिति होगी, अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। जानकारों का मानना है कि चीन के दबाव में आकर पाकिस्तान को अपनी धरती पर इस प्रोजेक्ट को शुरू करने की अनुमति देनी पड़ी है। ऐसे में वह कर्ज के मकड़जाल में भी फंसता जा रहा है। आरोप लगते रहे हैं कि CPEC Project के माध्यम से चीन विभिन्न देशों को अपने षडयंत्र में फंसाने की कोशिश कर रहा है। ऐसा कर वह इन देशों पर इतना कर्ज चढ़ा देगा कि भविष्य में वहां बीजिंग की मनमानी को रोकना संभव नहीं होगा। पाकिस्तान के साथ दोस्ती का दंभ भरकर चीन सिर्फ अपना उल्लू सीधा कर रहा है।

चीन की विस्तारवादी नीति और चालाकी को अमेरिका, भारत, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया और वियतनाम आदि देश भली-भांति जानते हैं। इसके चलते अमेरिका अक्सर चीन की मुखालफत करने से पीछे नहीं हटता। चीन का प्रभुत्व रोकने के लिए अमेरिका की अगुवाई में अलग से कई देशों का गठबंधन भी काम कर रहा है। इस गठबंधन ने बीजिंग की नींद उड़ा रखी है। चीन को चुनौती देने को कई देश अब एकजुट होने लगे हैं। अमेरिका को मालूम है कि यदि समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए तो समस्या और ज्यादा गंभीर हो जाएगी।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल में बीजिंग को सबक सिखाने के लिए कई ठोस कदम उठाए थे। इसके तहत कई प्रतिबंध लगाए गए थे। जिसके चलते चीन को काफी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा था। डोनाल्ड ट्रंप के हाथ से सत्ता जाने पर चीन की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था, मगर डोनाल्ड ट्रंप के बाद सत्ता में आए राष्ट्रपति बाइडेन ने भी बीजिंग को किसी प्रकार की रियायत नहीं दी। बाइडेन भी जानते हैं कि चीन का बढ़ता प्रभाव भविष्य में मुश्किलें उत्पन्न करेगा। इस कारण समुद क्षेत्र में अक्सर वाशिंगटन और बीजिंग में भिड़ंत होती रहती है। हांगकांग और वियतनाम के मामले में अमेरिका समय-समय पर चीन को चिढ़ता रहता है।