लेखक – राकेश कुमार भट्ट
(लेखक सामाजिक विश्लेषक हैं। डेढ़ दशक से प्रकृति, पर्यावरण और मनाव संसाधन प्रबंधन क्षेत्र से जुड़े हुए हैं और कई शोध पत्र तैयार किया है। इन विषयों पर अक्सर लिखते रहते हैं। यह लेख उदय भूमि के लिए लिखा है।)
भारत में तेजी से हो रहे शहरी विकास की कई चुनौतियां में से ठोस अपशिष्ट/तरल अपशिष्ट और सीवरेज का प्रबंधन और निपटान शहरी क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियों में से एक है। विभिन्न प्रकार के निरंतर हो रहे ठोस कचरे के उत्सर्जन से यह समस्या और विकराल रूप ले रही है। इस कारण यह पर्यावरण और भूमिगत जल को भी दूषित कर रहा है, जिसका सीधा प्रभाव हमारे स्वस्थ्य पर पड़ रहा है। आज भी हम उत्सर्जित कूड़े के निपटान के प्रति सजग नहीं हैं। अगर यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हम कचरे से घिरे रहेंगे और अस्वस्थ जीवन जी रहे होंगे। इसलिए हमें कचरे के निपटान के संबंध में जानना होगा और उसकी निपटान प्रक्रिया को भी अपनाना पड़ेगा। हमारे देश में अपशिष्ट के सुरक्षित निपटान में तीन प्रमुख घटक होते हैं, सबसे पहलेए उत्सजित अपशिष्ट संग्रह फिर कचरे का सुरक्षित स्थानांतरण और अंत में लैंडफिल साइट पर उचित निपटान।
अपशिष्ट संग्रह और लैंडफिल साइट पर इसके हस्तांतरण हेतु बड़ी जनशक्ति के साथ-साथ एक कुशल परिवहन प्रणाली की भी आवश्यकता होती है, जो कि एक बड़ी जिम्मेदारी का कार्य है और इस पर बड़ी मात्रा में धनराशि व्यय होगी। इसके साथ ही शहर में उत्सर्जित कचरे का पृथक्करण होना भी अति अनिवार्य है, जो या तो स्रोत पर या लैंडफिल में हो सकता है। इन दोनों में स्रोत पर अलगाव अधिक सरल और किफायती है। इस हेतु जन सहभागिता और जन-जागरूकता बहुत जरुरी है। सरकार नगर निगमों के माध्यम से इस हेतु बहुत प्रयास भी कर रही है। कचरे का असुरक्षित निपटान अब हमारे जीवन का अंग नहीं होना चाहिए। इस संबंध में कई अध्ययनों से यह संकेत भी मिलता है कि कचरे का असुरक्षित निपटान कई प्रकार के जीवन के लिए खतरनाक गैसों को उत्पन्न करता है, जो जीवन और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक है। भारत के पास पहले से ही कचरे के लिए उपलब्ध सभी लैंडफिल साइटों पर कचरे का दबाव बढ़ गया है और यूएलबी के पास नई जमीन हासिल करने के लिए पर्याप्त संसाधन भी नहीं हैं। इसके अलावाए नए लैंडफिल साइट ढूंढ?ा एक मुश्किल काम है और यह नियम विरूद्ध भी है। हम जानते हैं कि अधिकांश शहरी क्षेत्रों में ठोस कचरे का निपटान मुख्य रूप से यूएलबी की जिम्मेदारी है। हालांकि ये यूएलबी/नगर पालिकाएं कार्य के लिए जनशक्ति, वित्तीय संसाधनों और प्रौद्योगिकी से परिपूर्ण और सुसज्जित भी नहीं हैं। वे सभी अधिकांश संसाधनों के लिए राज्य सरकारों पर निर्भर हैं। इन यूएलबी/नगर पालिकाओं के पास कचरे का प्रबंधन करने के लिए दक्ष मानव संसाधन/इंजीनियरों या स्वच्छता कर्मचारी का भी अभाव है। इसके साथ ही तकनीकी जानकारी और संसाधनों की कमी के कारण लैंडफिल साइट प्रबंधन बहुत ही खराब है। दूसरी चुनौती शहरी क्षेत्रों में सीवरेज का प्रबंधन करना है। जिस तेजी से नगर सीमा का विस्तार हो रहा है, उस मात्रा में सीवरेज का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण है। शहरी सीमा में मात्र शौचालय का निर्माण करने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता, क्योंकि इन क्षेत्रों में उचित जलापूर्ति, सीवरेज नेटवर्क और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट कि भी आवश्यकता होगी। इस प्रक्रिया का पालन करने में बड़ी धनराशि, कुशल मानव संसाधन, समय, राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिबद्धता की भी आवश्यकता होगी। सोख पिट प्रणाली जो ग्रामीण क्षेत्रों में काम करती है, शहरी क्षेत्रों में स्थान की कमी और बढ़ते जनसंख्या घनत्व के कारण काम नहीं कर सकती है। सीवरेज नेटवर्क और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बिछाने का काम फिर से राज्य और यूएलबी/नगर पालिकाओं के बीच वितरित किया जाता है, जिसमे आज भी कई प्रकार की जटिलताएं हैं। अगर हम स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) द्वारा अपनाई गई रणनीति को देखें तो इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों, सामुदायिक शौचालयों, सार्वजनिक मूत्रालयों के निर्माण और आईईसी गतिविधियों के संचालन पर है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए निर्धारित फंड न्यूनतम हैं। इसी तरह सीवरेज नेटवर्क बिछाने और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए धन का सीमित प्रावधान है। प्रत्येक घर तक पर्याप्त जलापूर्ति और सीवर की उपलब्धता आज भी नहीं है, इसलिए स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) के लक्ष्य को आत्मसात और पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है, जिसमें ठोस अपशिष्ट और सीवर प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया है। कचरे के संग्रह और उसके निपटान के लिए सरकार द्वारा यूएलबी को आवश्यक धनराशि भी प्रदान की जा रही ताकि वे अपने कार्य को सुगमता से संपन्न कर सके। साथ ही लैंडफिल साइटों के विकास, वेस्ट ट्रीटमेंट के लिए अलग से धन और तकनीकी सहयोग भी दिया जाना चाहिए। यूएलबी के प्रतिनिधियों को प्रमुख शहरों में अपशिष्ट संग्रह के लिए सर्वोत्तम संभव अभ्यासों का अध्ययन और अनुकरण किए जाने हेतु भी भेजा जाना चाहिए। जब तक हम घरों, बाजारों, सडकों आदि से कचरे को व्यवस्थित रूप से दैनिक रूप से उठाने में सक्षम नहीं होंगे, शहरों में कचरे के निपटान के प्रणालीगत मुद्दे का समाधान नहीं होगा और तब तक स्वच्छता का कोई अर्थ भी नहीं होगा। स्वच्छ भारत मिशन की सफलता न केवल मानसिकता बदलने पर निर्भर करती है बल्कि यूएलबी/नगर पालिकाओं और राज्य सरकारों द्वारा कचरे के निपटान के तरीके में भी बदलाव पर निर्भर करती है, क्योंकि शहरी क्षेत्रों में अधिक तेजी से बढ़ती आबादी बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करती है। अत: अब हमें समस्या के साथ-साथ समाधान पर भी विचार करना होगा और एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभाने के साथ ही सरकार के प्रयासों को भी मजबूत करना होगा।
अपशिष्ट संग्रह और लैंडफिल साइट पर इसके हस्तांतरण हेतु बड़ी जनशक्ति के साथ-साथ एक कुशल परिवहन प्रणाली की भी आवश्यकता होती है, जो कि एक बड़ी जिम्मेदारी का कार्य है और इस पर बड़ी मात्रा में धनराशि व्यय होगी। इसके साथ ही शहर में उत्सर्जित कचरे का पृथक्करण होना भी अति अनिवार्य है, जो या तो स्रोत पर या लैंडफिल में हो सकता है। इन दोनों में स्रोत पर अलगाव अधिक सरल और किफायती है। इस हेतु जन सहभागिता और जन-जागरूकता बहुत जरुरी है। सरकार नगर निगमों के माध्यम से इस हेतु बहुत प्रयास भी कर रही है। कचरे का असुरक्षित निपटान अब हमारे जीवन का अंग नहीं होना चाहिए। इस संबंध में कई अध्ययनों से यह संकेत भी मिलता है कि कचरे का असुरक्षित निपटान कई प्रकार के जीवन के लिए खतरनाक गैसों को उत्पन्न करता है, जो जीवन और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक है। भारत के पास पहले से ही कचरे के लिए उपलब्ध सभी लैंडफिल साइटों पर कचरे का दबाव बढ़ गया है और यूएलबी के पास नई जमीन हासिल करने के लिए पर्याप्त संसाधन भी नहीं हैं। इसके अलावाए नए लैंडफिल साइट ढूंढ?ा एक मुश्किल काम है और यह नियम विरूद्ध भी है। हम जानते हैं कि अधिकांश शहरी क्षेत्रों में ठोस कचरे का निपटान मुख्य रूप से यूएलबी की जिम्मेदारी है। हालांकि ये यूएलबी/नगर पालिकाएं कार्य के लिए जनशक्ति, वित्तीय संसाधनों और प्रौद्योगिकी से परिपूर्ण और सुसज्जित भी नहीं हैं। वे सभी अधिकांश संसाधनों के लिए राज्य सरकारों पर निर्भर हैं। इन यूएलबी/नगर पालिकाओं के पास कचरे का प्रबंधन करने के लिए दक्ष मानव संसाधन/इंजीनियरों या स्वच्छता कर्मचारी का भी अभाव है। इसके साथ ही तकनीकी जानकारी और संसाधनों की कमी के कारण लैंडफिल साइट प्रबंधन बहुत ही खराब है। दूसरी चुनौती शहरी क्षेत्रों में सीवरेज का प्रबंधन करना है। जिस तेजी से नगर सीमा का विस्तार हो रहा है, उस मात्रा में सीवरेज का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण है। शहरी सीमा में मात्र शौचालय का निर्माण करने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता, क्योंकि इन क्षेत्रों में उचित जलापूर्ति, सीवरेज नेटवर्क और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट कि भी आवश्यकता होगी। इस प्रक्रिया का पालन करने में बड़ी धनराशि, कुशल मानव संसाधन, समय, राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिबद्धता की भी आवश्यकता होगी। सोख पिट प्रणाली जो ग्रामीण क्षेत्रों में काम करती है, शहरी क्षेत्रों में स्थान की कमी और बढ़ते जनसंख्या घनत्व के कारण काम नहीं कर सकती है। सीवरेज नेटवर्क और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बिछाने का काम फिर से राज्य और यूएलबी/नगर पालिकाओं के बीच वितरित किया जाता है, जिसमे आज भी कई प्रकार की जटिलताएं हैं। अगर हम स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) द्वारा अपनाई गई रणनीति को देखें तो इसका मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत घरेलू शौचालयों, सामुदायिक शौचालयों, सार्वजनिक मूत्रालयों के निर्माण और आईईसी गतिविधियों के संचालन पर है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए निर्धारित फंड न्यूनतम हैं। इसी तरह सीवरेज नेटवर्क बिछाने और सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए धन का सीमित प्रावधान है। प्रत्येक घर तक पर्याप्त जलापूर्ति और सीवर की उपलब्धता आज भी नहीं है, इसलिए स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) के लक्ष्य को आत्मसात और पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है, जिसमें ठोस अपशिष्ट और सीवर प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया है। कचरे के संग्रह और उसके निपटान के लिए सरकार द्वारा यूएलबी को आवश्यक धनराशि भी प्रदान की जा रही ताकि वे अपने कार्य को सुगमता से संपन्न कर सके। साथ ही लैंडफिल साइटों के विकास, वेस्ट ट्रीटमेंट के लिए अलग से धन और तकनीकी सहयोग भी दिया जाना चाहिए। यूएलबी के प्रतिनिधियों को प्रमुख शहरों में अपशिष्ट संग्रह के लिए सर्वोत्तम संभव अभ्यासों का अध्ययन और अनुकरण किए जाने हेतु भी भेजा जाना चाहिए। जब तक हम घरों, बाजारों, सडकों आदि से कचरे को व्यवस्थित रूप से दैनिक रूप से उठाने में सक्षम नहीं होंगे, शहरों में कचरे के निपटान के प्रणालीगत मुद्दे का समाधान नहीं होगा और तब तक स्वच्छता का कोई अर्थ भी नहीं होगा। स्वच्छ भारत मिशन की सफलता न केवल मानसिकता बदलने पर निर्भर करती है बल्कि यूएलबी/नगर पालिकाओं और राज्य सरकारों द्वारा कचरे के निपटान के तरीके में भी बदलाव पर निर्भर करती है, क्योंकि शहरी क्षेत्रों में अधिक तेजी से बढ़ती आबादी बड़ी मात्रा में कचरा पैदा करती है। अत: अब हमें समस्या के साथ-साथ समाधान पर भी विचार करना होगा और एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभाने के साथ ही सरकार के प्रयासों को भी मजबूत करना होगा।















