रस्सी जल गई पर बल नहीं गए, यह चर्चित कहावत आजकल शिवसेना पर चरितार्थ हो रही है। महाराष्ट्र की सत्ता हाथ से लगभग फिसल जाने के बावजूद शिवसेना की मरोड़ कम नहीं हो पाई है। शिवसेना के नेताओं और कार्यकर्ताओं की बौखलाहट सामने आने लगी है। सीनाजोरी पर उतारू शिवसैनिक अब शांति एवं कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने से भी बाज नहीं आ रहे हैं। 38 बागी विधायकों के परिवारों की सुरक्षा वापस ले ली गई है। इसके बाद शिवसैनिक गुंडागर्दी पर उतर आए हैं। बागी विधायक तानाजी शिंदे के कार्यालय में दिनदहाड़े घुसकर तोड़-फोड़ कर दी गई।
तानाजी के कारोबारी को भी काफी नुकसान पहुंचा है। सुरक्षा वापस लिए जाने से बागी विधायकों के परिवारों की चिंता बढ़ गई है। शिवसेना के वरिष्ठ नेता एवं प्रवक्ता संजय राउत आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। राउत के आक्रामक बयान के बाद शिवसैनिक सड़कों पर उतर कर उपद्रव मचाने लगे हैं। इससे साफ है कि शिवसेना के नेता एवं कार्यकर्ता अब बागी विधायकों को डरा-धमका कर अपनी खींज उतार रहे हैं। महाराष्ट्र में शिवसेना की गुंडागर्दी का पुराना इतिहास रहा है। अपनी बात मनवाने के लिए वह कानून व्यवस्था का मखौल उड़ाने से भी बाज नहीं आती है।
एकनाथ शिंदे द्वारा बागी रूख अपना लिए जाने के बाद से महाराष्ट्र की सत्ता डोलने लगी है। शिंदे के साथ शिवसेना के 38 विधायक जा चुके हैं। इतने विधायकों का समर्थन खो बैठने के बाद भी मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। एक तरफ वह सत्ता लोभी न होने का दावा करते हैं, दूसरी ओर अपने पद पर अब तक काबिज हैं। पिछले 56 साल में शिवसेना को पहली बार घर के भीतर इतना नुकसान उठाना पड़ रहा है। बागी विधायकों ने साफ कर दिया है कि वह बाला साहब ठाकरे की विचाराधारा कर समर्थन करते हैं। उद्धव ठाकरे की विचाराधारा से वह सहमत नहीं हैं। बागी विधायकों ने उद्धव ठाकरे पर हिंदुत्व की विचाराधारा से इतर चलने का आरोप लगाया है।
फिलहाल महाराष्ट्र की यह जंग दिन-प्रतिदिन दिचस्प होती दिखाई दे रही है। ऊंट किस करवट बैठेगा, इसके लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा। इस पूरे घटनाक्रम के लिए वैसे शिवसेना नेतृत्व को ज्यादा जिम्मेदार माना जा रहा है। क्योंकि सत्ता की लालसा में पार्टी ने अपनी मूल विचाराधारा तक को पीछे छोड़ दिया। कांग्रेस और राष्ट्रीय क्रांति पार्टी (राकांपा) के सहयोग से उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बेशक बन गए, मगर अपने पुराने सहयोगियों को एकजुट रखने में वह नाकाम रहे। शिवसेना की हिंदुत्ववादी छवि पर भी असर पड़ा। सत्ता संचालन में ठाकरे इतने व्यस्त हो गए कि उन्हें अपनी पुराने एवं वफादार साथियों के मन की पीड़ा को जानने तक का मौका नहीं मिला।
महाराष्ट्र में आए सियासी भूचाल के केंद्र में शिवसेना नेता एकनाथ शिंदे हैं। वह महाराष्ट्र सरकार में कैबिनेट मंत्री होने के साथ-साथ विधायक दल के नेता की जिम्मदारी भी निभा रहे थे। महाराष्ट्र में एमएलसी चुनाव के नतीजे आने के बाद से शिवसेना में घमासान मचना शुरू हो गया था। एमएलसी चुनाव में 10 में से 5 सीट पर भाजपा ने जीत दर्ज की है। एमएलसी चुनाव के नतीजे आने के अगले दिन यह सियासी घटनाक्रम सामने आया। दरअसल ऐसी चर्चाएं जोरों पर थी कि महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे के मध्य रिश्ते अच्छे नहीं हैं।
इसके चलते शिंदे को बागी रूख अपनाना पड़ा। महाराष्ट्र में शिवसैनिकों के उत्पात को देखकर विरोध की आवाजें भी उठने लगी हैं। अमरावती से सांसद नवनीत राणा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से विधायकों के परिवारों के लिए सुरक्षा की पुरजोर मांग की है। उन्होंने कहा है कि मैं अमित शाह से उन विधायक के परिवारों को सुरक्षा प्रदान करने का अनुरोध करती हूं जो उद्धव ठाकरे को छोड़कर बाला साहेब की विचारधारा से जुड़े रहकर अपने निर्णय ले रहे हैं। उद्धव ठाकरे की गुंडागर्दी खत्म हो, मैं राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का अनुरोध करती हूं।
बागी विधायकों के खिलाफ शिवसेना नेता संजय राउत ने कमान संभाल रखी है। उन्होंने बागी विधायकों से घर वापसी की अपील की है। उन्होंने कहा है कि दर-दर की ठोकरें खाने की जरूरत क्या। अपील करने के साथ उन्होंने चेतावनी भी दे डाली है। राउत ने कहा कि ‘बाला साहब के भक्त हैं तो उनका मंदिर बनाओ। पार्टी को हाईजैक करने की कोशिश की तो तलवार से तलवार भिड़ेंगी, बंदूक से बंदूक भिड़ेंगी। खास बात है कि गुवाहाटी में ठहरा बागी खेमा लगातार दिवंगत बाला साहब ठाकरे के समर्थन में बातें कर रहा है।
















