दोस्तों से झटका, क्या फंस गया अमेरिका ?

लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)

अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान संघर्ष कब जाकर समाप्त होगा, कोई नहीं जानता। युद्ध की वजह से दिन-प्रतिदिन सकल विश्व की चिंता बढ़ रही है। विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ने लगा है। इस बीच इस जंग में बाहुबली अमेरिका बुरी तरह फंस गया लगता है। यह मसला उसके गले की फांस जैसा नजर आने लगा है। ईरान को अपनी शर्तों पर बैकफुट पर लाने की यूएस की रणनीति नाकाम हो गई है। ऊपर से सहयोगी देशों ने उसे जरूरत के समय बड़ा झटका दे डाला है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति पर सवाल उठने लगे हैं। ईरान से उलझ कर अमेरिका और इजरायल ने क्या बड़ी गलती कर दी है? आवेश में आकर युद्ध की शुरुआत कर क्या अमेरिका बुरी तरह फंस गया है? डोनाल्ड ट्रंप की प्रतिष्ठा क्या दांव पर लग गई है? क्या उन्हें आगे का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है? ईरान को तहस-नहस करने के लिए क्या अमेरिका-इजरायल कोई भयावह कदम उठाने की तैयारी में हैं? क्या ईरान के साथ-साथ यूएस की अर्थव्यवस्था भी बर्बाद हो जाएगी? देश-दुनिया में यह ज्वलंत सवाल खूब उठ रहे हैं।

दुनिया के सबसे अहम व्यापारिक समुद्री मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ की सुरक्षा की खातिर कुछ देशों से सहयोग करने की डोनाल्ड ट्रंप की अपील बेअसर होने से जरूरी सवाल खड़े हो गए हैं। चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन आदि देशों ने ट्रंप को मानो ठेंगा दिखा दिया है। चीन और अमेरिका का छत्तीस का आंकड़ा है। ऐसे में चीन द्वारा ट्रंप के प्रस्ताव को ठुकरा देना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, मगर बाकी देशों की अमेरिका के साथ खूब छनती रही है। हालांकि इन देशों ने इस महाजंग से खुद को दूर रखना बेहतर समझा है। ऑस्ट्रेलिया को प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका का सबसे वफादार सहयोगी माना जाता है, मगर वहां की सरकार ने होर्मुज स्ट्रेट में अपना युद्धपोत भेजने से साफ मना कर दिया है। दरअसल ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से समुद्री जहाजों के आवागमन को लेकर कुछ कड़ी शर्तें लागू कर रखी हैं। इन शर्तों का पालन किए बगैर किसी भी देश का जहाज इस मार्ग का उपयोग नहीं कर सकता है। ईरान ने खासकर अमेरिका और इजरायल के जहाजों की एंट्री बिल्कुल बंद कर रखी है। जानकारों का मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अमेरिका के घटते प्रभाव का संकेत है।

जिस ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ से दुनिया का बीस प्रतिशत तेल गुजरता है, वहां सुरक्षा के नाम पर ट्रंप का साथ देने को कोई भी अपना युद्धपोत जोखिम में डालने को तैयार नहीं है। वैसे अमेरिका की चौधराहट को पिछले कुछ समय में इस प्रकार की चुनौतियां मिली हैं, जिनकी उम्मीद ट्रंप प्रशासन ने नहीं की थी। डोनाल्ड ट्रंप के मनमाने रवैये के कारण सहयोगी देश भी खासे परेशान चल रहे हैं। ऐसे में सहयोगी देशों ने अमेरिका से दूरी बनानी शुरू कर दी है। इससे यूएस की साख को नुकसान पहुंच रहा है। सुप्रीम लीडर खामेनेई के अलावा बड़ी संख्या में उच्चाधिकारियों और आम नागरिकों की जान जाने के बावजूद ईरान ने युद्ध से पीछे हटने का मन नहीं बनाया है। वह निरंतर पलटवार कर विरोधियों को परेशान कर रहा है। इस युद्ध में भारत का रुख सबसे बेहतर है। वह किसी पक्ष के समर्थन में खुलकर बात नहीं कर रहा। भारत ने बार-बार युद्ध रोकने व शांति की वकालत की है। फिलहाल दुनिया के दो ताकतवर राजनीतिज्ञ डोनाल्ड ट्रंप व नेतन्याहू की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। ईरान यदि सरेंडर नहीं करता तो ट्रंप और नेतन्याहू की न सिर्फ मुश्किलें बढ़ेंगी बल्कि उन्हें घरेलू मोर्चे पर भी जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ सकता है। चिंता इस बात की भी नजर आती है कि ट्रंप अपनी हार को बर्दाश्त नहीं कर पाएं और गुस्से में आकर कोई ऐसा कदम उठा दें, जो मानवता के लिए बेहद विनाशकारी साबित हो।

चूंकि ट्रंप को अब तक यह समझ में आ गया है कि इस लड़ाई वह अकेला पड़ चुका है। अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ एकतरफा युद्ध तब शुरू किया, जब समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी और माना जा रहा था कि इस बार कोई रास्ता निकल सकता है। इस एकतरफा फैसले का ही असर था कि ब्रिटेन ने शुरू में अपने सैन्य अड्डे इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी थी, जिसे लेकर ट्रंप आज तक नाराज बताए जाते हैं। अमेरिका-इजरायल सिर्फ ईरान की ताकत को ही भांपने में गलत साबित नहीं हुए, बल्कि यह समझने में भी चूक कर गए कि संघर्ष कितना व्यापक हो सकता है। अब इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। धरती का सबसे व्यस्त तेल मार्ग बंद है। बढ़ती अनिश्चितता ने क्रूड ऑयल के दाम को सौ डॉलर प्रति बैरल के आगे पहुंचा दिया है। पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था दबाव का सामना कर रही है। हालात पर साफगोई की उम्मीद डोनाल्ड ट्रंप से अब भी नहीं की जा सकती है। वह तो अपने दावे पर कायम हैं कि ईरान समझौता करना चाहता है, जबकि तेहरान बार-बार कह रहा है कि अमेरिका को उसकी आक्रामकता का जवाब दिया जाएगा। ईरान युद्ध पश्चिम एशिया को लेकर अमेरिका के गलत आंकलनों और पूर्वाग्रहों का एक और नमूना है।