योग मेरे लिए एक दिन नहीं, हर दिन की साधना है: सुबोध श्रीवास्तव

-अवैध शराब के खिलाफ सख़्त, जीवन के लिए योग में नर्म एक अधिकारी, दो प्रेरणाएं
-जिला आबकारी अधिकारी सुबोध श्रीवास्तव ने योग को बनाया अपनी दिनचर्या का हिस्सा, टीम को भी दे रहे हैं निरोगी जीवन का मंत्र

उदय भूमि संवाददाता
ग्रेटर नोएडा। जिस अधिकारी का नाम सुनते ही शराब माफिया जिले से खिसकने लगते हैं, वही अधिकारी जब योग के आसनों में लीन होते हैं तो लगता है जैसे संयम, अनुशासन और स्वास्थ्य का जीवंत उदाहरण हमारे सामने है। गौतमबुद्ध नगर के जिला आबकारी अधिकारी सुबोध कुमार श्रीवास्तव, जो अवैध शराब के नेटवर्क को ध्वस्त करने में लगातार सक्रिय हैं, अब योग को जीवन की मूलधारा में शामिल कर एक नई सामाजिक दिशा भी दे रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर जब पूरा देश एक दिन के योग में जुटा था, तब सुबोध श्रीवास्तव ने एक बार फिर यह संदेश दोहराया कि योग कोई उत्सव नहीं, यह जीवन जीने की विधा है। उन्होंने अपने आवास पर दैनिक योगाभ्यास करते हुए यह स्पष्ट किया कि स्वस्थ शरीर और संयमित मन की कुंजी योग में निहित है, जिसे अपनाकर न केवल व्यक्ति स्वयं को, बल्कि समाज को भी स्वस्थ बना सकता है।

उनका मानना है कि आज की तेज रफ्तार, तनाव और अनियमित दिनचर्या के युग में योग ही वह स्थिरता और ऊर्जा प्रदान करता है, जिसकी सबसे अधिक आवश्यकता है। यही कारण है कि वे न केवल स्वयं नियमित योग करते हैं, बल्कि अपनी पूरी टीम को भी इसका अभ्यास करने और इसे अपनाने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। मैं योग को कोई रस्मी आयोजन नहीं मानता। यह मेरी ऊर्जा का स्रोत है, मेरी मानसिक स्पष्टता का आधार है और मेरी दिनचर्या का अभिन्न अंग है, यह कहते हुए उन्होंने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है कि कैसे एक प्रशासनिक अधिकारी कर्तव्य और स्वास्थ्य दोनों में संतुलन स्थापित कर सकता है।

श्रीवास्तव के नेतृत्व में जहां अवैध शराब कारोबारियों पर लगातार शिकंजा कस रहा है, वहीं वे व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन, स्वास्थ्य और संतुलन की मिसाल बनकर उभर रहे हैं। आज जब योग को विश्व पटल पर पहचान मिल चुकी है, तब ज़रूरत है ऐसे ही कर्मयोगियों की, जो इसे केवल प्रचार नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारकर दिखाएं। सुबोध श्रीवास्तव की यह जीवनशैली आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन सकती है कि अगर स्वास्थ्य है, तभी सेवा और संघर्ष संभव है।