-भोपाल गैस आपदा पर यशोदा के चिक्तिसकों ने दिए सुझाव
दिल्ली/गाजियाबाद। भारत में राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस भोपाल गैस आपदा में अपनी जान गंवाने वाले लोगों की याद में हर साल 2 दिसंबर को प्रदूषण के प्रभावों और समस्याओं के बारे में लोगों को उचित जानकारी देने के लिए मनाया जाता है। आपको याद दिला दें कि भोपाल गैस आपदा औद्योगिक दुर्घटना 1984 में हुई थी जब गैस मिथाइल आइसोसाइनेट 2-3 दिसंबर की रात को लीक हो गई और हजारों लोगों की मौत हो गई। राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस 2021 के वर्ष का विषय किसी भी अन्य वर्ष की तरह है। प्रदूषण नियंत्रण के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाएं और लोगों को प्रदूषण को रोकने के तरीके के बारे में शिक्षित करें।
डॉ. अर्जुन खन्ना एमडी (इंटरनल मेडिसिन) डीएम (पल्मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन) सीनियर कंसल्टेंट चेस्ट फिजिशियन यशोदा सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल कौशाम्बी ने इस संबध में अपनी राय सांझा करते हुए बताया कि अगर आप दिल्ली-एनसीआर में और उसके आसपास रहते हैं और यह लेख पढ़ रहे हैं तो यह संभावना है, कि आप पिछले कुछ हफ्तों से खांस रहे हैं, छींक रहे हैं, अस्वस्थ और थके हुए हैं। पिछले कुछ वर्षों से इस मौसम के दौरान दिल्ली में आने वाली वार्षिक वायु प्रदूषण आपदा से आप प्रभावित हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में से एक है और दिल्ली एनसीआर क्षेत्र दुर्भाग्य से देश का सबसे प्रदूषित शहर है।
डॉ खन्ना ने बताया कि हमारे शहर में हवा की गुणवत्ता शरीर के सभी अंगों के लिए खतरनाक और जहरीली है और मुझे दिल्ली में कार्यरत एक छाती रोग चिकित्सक के रूप में पिछले कुछ दिनों में तीव्र श्वसन संकट और बिगड़ते अस्थमा के रोगियों की संख्या में वृद्धि का अनुभव हो रहा है। एक 5 साल बच्चे के पिता के रूप में जो इस शहर में पैदा हुआ था और शायद अपने जीवन के एक बड़े समय के लिए यहां रहेगा। उसके लिए मुझे डर लग रहा है। क्या मेरा बच्चा इस प्रदूषण से प्रभावित होगा। यदि उसके अभी भी विकसित हो रहे फेफड़े प्रदूषण के इतने उच्च स्तर के प्रदूषण के संपर्क में हैं, तो क्या उसका जीवन काल कम हो जाएगा।
अनुसंधान ने स्पष्ट रूप से दिखाया है कि वायु प्रदूषण एक प्रमुख हत्यारा है और इसका न केवल फेफड़ों पर बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और आईक्यू सहित शरीर के अंगों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
डॉ खन्ना कहते हैं कि बड़े पैमाने पर हमें अपने सांस लेने के अधिकार के लिए लड़ाई लडऩी होगी जिसमे हर व्यक्ति का योगदान अपेक्षित है। व्यक्तिगत स्तर पर, कुछ चीजें हैं जो हमें प्रदूषण के खतरे से बेहतर तरीके से निपटने में मदद कर सकती हैं। सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण, अगर आपको कोई सांस की बीमारी है, तो अपने चिकित्सक को समय से परामर्श हेतु दिखाएं। यदि आवश्यक हो तो वे आपको साँस की दवाएं, पंप, रोटाकैप आदि लिखेंगे। कृपया पंप और इनहेलर का उपयोग करने में संकोच न करें। अगर सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए तो ये दवाएं बिल्कुल सुरक्षित हैं और आपको बेहतर सांस लेने में मदद करेंगी। जब भी आप अपने घर से बाहर निकलें तो अपने चेहरे और नाक को ढकने के लिए एन-95 मास्क का इस्तेमाल करें। वायु प्रदूषण, आपको फेफड़ों के संक्रमण के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है और टीके इन संक्रमणों को रोकने में आपकी मदद करेंगे। यह देखा गया है कि हमारे घरों और कार्यालयों के अंदर हवा की गुणवत्ता कई बार बाहर की हवा से भी बदतर होती है। बहुत से लोग हमसे पूछते हैं कि क्या एयर प्यूरीफायर मददगार हैं।
बच्चों के स्वास्थ्य पर हो रहा गहरा असर

डॉ. दीपिका रस्तोगी, कंसल्टेंट नियोनेटोलॉजी एंड पीडियाट्रिक्स ने युवा, शिशुओं और बच्चों पर प्रदूषण के प्रभाव पर अपनी बात रखी, उनका कहना है कि वायु प्रदूषण का मतलब हवा की खराब गुणवत्ता है, जो नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और ओजोन जैसी कणों और गैसों द्वारा खराब होती है। प्रदूषण दुनिया भर में सबसे कमजोर आबादी को प्रभावित करता है। शिशुओं और बच्चों को कई कारणों से खराब गुणवत्ता वाली हवा के संपर्क में आने से विशेष चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
जानिए जरूरी बिंदु
1-जन्म के बाद बच्चों के 7 साल की उम्र तक फेफड़े बढ़ते हैं और परिपक्व होते रहते हैं। 80 प्रतिशत वायुकोष जन्म के बाद विकसित होते हैं।
2-बच्चों के शरीर रक्षा तंत्र अभी भी विकसित हो रहे हैं।
3-बार-बार श्वसन संक्रमण के लिए उनकी सहज संवेदनशीलता उन्हें वायु प्रदूषण के प्रभावों के प्रति और भी अधिक संवेदनशील बनाती है।
4-उनकी बाहरी सक्रिय खेल गतिविधियाँ इस संवेदनशीलता को बढ़ाती हैं।
प्रदूषण से बच्चों के जीवन विकास हो रहे प्रभावित
डॉ दीपिका का कहना है कि वायु प्रदूषण इन बच्चों को उनके जीवन के विकास के चरण के दौरान प्रभावित करता है जिससे संभावित रूप से आजीवन स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं। शोध ने बच्चों के जन्म से पहले ही वायु प्रदूषण के प्रभाव के पुख्ता सबूत दिखाए हैं। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया के कई अध्ययनों ने वायु प्रदूषण को समय से पहले जन्म के लिए एक स्वतंत्र जोखिम कारक पाया है। अनुसंधान ने यह भी सुझाव दिया है कि गर्भावस्था के कमजोर चरण के दौरान ये प्रभाव भ्रूण के फेफड़ों के विकास और विकास को प्रभावित कर सकते हैं। स्विट्जऱलैंड के शोधकर्ताओं के एक समूह ने पाया कि इन बच्चों को जन्म के समय श्वसन सहायता की अधिक आवश्यकता थी। श्वसन प्रणाली पर इन शुरुआती प्रभावों के परिणामस्वरूप जीवन में बाद में अस्थमा जैसी सांस लेने में समस्या हो सकती है और जीवन प्रत्याशा कम हो सकती है।
डॉ. दीपिका ने बताया कि वायु प्रदूषण बच्चों को उनके जीवन के विकासात्मक चरण के दौरान प्रभावित करता रहता है। यूरोपीय श्वसन समाज के साथ-साथ यूके स्थित शोध के अनुसार, वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों में मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। यह उनके फेफड़ों के विकास और वृद्धि को प्रभावित करता है। बचपन में खराब वायु गुणवत्ता का लगातार संपर्क उनके फेफड़ों के कार्य को प्रभावित करता है, जिससे उन्हें अस्थमा और पुरानी सांस की बीमारियों का शिकार होना पड़ता है। श्वास,जीवन को बनाए रखने के लिए आवश्यक सबसे बुनियादी चीज है और युवा जीवन में इस तरह का जोखिम सिगरेट पीने जैसा है। वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से इन छोटे बच्चों के मस्तिष्क पर भी दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकता है। यह उनके संज्ञानात्मक प्रदर्शन, सीखने के साथ-साथ व्यवहार को भी प्रभावित कर सकता है। हम वायु गुणवत्ता सूचकांक में सुधार होने तक व्यायाम और खेल सहित इनडोर गतिविधियों को प्रोत्साहित कर सकते हैं। माता-पिता के रूप में, अभिभावक के रूप में, जिम्मेदार नागरिक के रूप में, हमारे देश में खराब वायु गुणवत्ता की इस डरावनी विकसित स्थिति को नियंत्रित करने और हमारे बच्चों को खतरनाक परिणामों से बचाने के लिए उचित कार्रवाई करना हमारी जिम्मेदारी है। यदि आप, आपके बच्चे या आपके परिवार में कोई व्यक्ति सांस लेने से संबंधित किसी भी लक्षण से जूझ रहा है, तो कृपया तुरंत अपने चिकित्सक या बाल रोग विशेषज्ञ से परामर्श लें।
















