अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नही, बिल्डरों की सुध लेगा कौन: प्रदीप गुप्ता

गाजियाबाद। नोएडा में सुपरटेक के ट्विन टावर मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री सीएम योगी आदित्यनाथ बेहद सख्त नजर आ रहे हैं। सीएम योगी ने इस मामले की जांच के लिए शासन स्तर पर एसआईटी गठित करने का निर्देश दिया है। साथ ही साल 2004 से 2017 तक इस मामले से जुड़े प्राधिकरण के अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए गए हैं। इससे पहले बुधवार को सीएम योगी ने ट्विन टावरों के निर्माण में कथित अनियमितता के आरोपी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। देश में व्यापारियों की अग्रणी व्यापारी एकता समिति संस्थान योगी सरकार के इस फैसले का स्वागत करती है। संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रदीप गुप्ता का कहना है कि सुपरटेक एमराल्ड केस में उच्चतम न्यायालय ने एक सख्त टिप्पणी कर नोएडा के एमराल्ड कोर्ट के ट्विन टावर गिराने का आदेश दिया है। 40-40 मंजिल के इन दो ट्विन टावर्स को गिराने का आदेश देते हुए कोर्ट ने नोएडा अथॉरिटी को भी जमकर फटकार लगाई है। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी में साफ कहा है कि नियमों का उल्लंघन होने के बावजूद नोएडा अथॉरिटी ने बिल्डर के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। अदालत में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने मामले में फैसला सुनाते हुए दोनों ट्विन टावर्स को 3 महीने के भीतर अपने खर्च पर ध्वस्त करने और फ्लैट खरीदने वाले सारे बायर्स को 12 फीसदी ब्याज के साथ पैसे लौटाने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि इन ट्विन टावर्स को तोड़ते समय किसी भी तरह से अन्य इमारतों को नुकसान ना पहुंचाया जाए। देश की सर्वोच्च अदालत ने ये फ़ैसला दिया है, इस पर सवाल उठाने का अब कोई औचित्य नहीं रह गया है । लेकिन इस फ़ैसले का गहराई से अध्ययन करने के बाद मन में कुछ विचार उठे हैं जिसे मैं आप सबसे साझा करना चाहता हूँ। इस फ़ैसले में सारा आर्थिक बोझ बिल्डर पर डाल दिया गया है। लेकिन क्या प्राधिकरण के उन अधिकारियों पर भी आर्थिक दंड नहीं लगना चाहिए जो इस इमारत को बनवाने में हर तरफ से सहयोग दे रहे थे। प्राधिकरण की कर हर तरह का एनओसी दे रहे थे। इमारत बनने की शुरुआत से लेकर अब तक प्राधिकरण के जितने छोटे बड़े अशिकारी इस मे शामिल रहे हैं उन सबको बेनकाब किया जाय भले ही वो रिटायर क्यों न हो गए हों। और बिल्डर पर लगाए गए आर्थिक दंड में उन्हें भी बराबर का भागीदार बनाया जाए । तभी इस तंत्र को पूरी तरह तोड़ा जा सकता है । और आगे इस तरह की भ्रष्टाचार की कोई इमारत न बन सकें। अब सवाल ये भी कि है कि क्या पहले नोटबंदी, जीएसटी और कोरोना की दो लहरों का सामना करने के बाद बिल्डर की ऐसी आर्थिक हालात हैं कि वो इतनी बड़ी रकम 12 फ़ीसदी ब्याज के साथ लौटा सके । और अगर उसके पास इतने पैसे नहीं हैं तो अब वो क्या करेगा? क्या वो दिवालिया होने की गुहार लगाएगा? अगर बिल्डर ने हाथ खड़े कर दिए तो ये पैसे कौन भरेगा और ऐसी हालात में आगे क्या होगा किसी को नहीं मालूम। अब उन ठेकेदारों की कौन सुध लेगा जिन्होंने इस टावर में काम किए। और उनके करोड़ों रुपए जो फंसे हैं अब उसका क्या होगा? वो पैसे उन्हें कौन देगा? इसका जवाब भी फिलहाल किसी के पास नहीं है। मैं सरकार और अदालत दोनों से अनुरोध करता हूँ कि इस इस मामले में ऐसा कदम उठाए की सबके हितों की रक्षा हो सके। नहीं तो जिस तरह से बिल्डरों पर शिकंजा कसता जा रहा है वो दिन दूर नहीं जब सरकार को सबसे ज़्यादा राजस्व और करोड़ों लोगों को रोजगार देने वाला रियल स्टेट के कारोबार से लोग तौबा कर लें।