चोर मचाए शोर, आखिर कब सुधरेगा पाकिस्तान ?

नई दिल्ली। उलटा चोर कोतवाल को डांटे, यह चर्चित कहावत पाकिस्तान पर बिल्कुल सटीक बैठ रही है। गुनाहों की लंबी फेहरिस्त होने के बावजूद वह हमेशा खुद को पीड़ित, प्रताड़ित और पाक-साफ होने का ढोंग करता रहता है। आतंकवादियों का शुभचिंतक यह मूल्क समय-समय पर बेनकाब होता रहा है। इसके बावजूद सुधार की कोई गुंजाइश दिखाई नहीं देती। भारत से बार-बार मुंह की खाने के बाद भी वह कोरा झूठ बोलने और बड़बोलेपन से बाज नहीं आ सका है। भारत के खिलाफ वह एक बार फिर भ्रामक और झूठा प्रचार कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहानुभूति बटोरने की कोशिश में है। हालांकि इस प्रकार की नापाक चाल चल वह कभी सफल नहीं हो सका है।
पाकिस्तान के लाहौर शहर में कुछ दिन पहले आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद के घर के पास जोरदार धमाका हुआ था। इससे समूचे मूल्क में एकाएक अफरा-तफरी मच गई थी। इस घटना के लिए पाक सरकार ने अब भारत को जिम्मेदार ठहराया है। पाकिस्तान का आरोप है कि लाहौर में बम धमाके के पीछे भारत की खुफिया एजेंसी रॉ के एजेंट की महत्वपूर्ण भूमिका है। जांच में यह बात सामने आने का दावा किया गया है। पाकिस्तान के इन आरोपों का भारत खंडन कर चुका है। इसके पहले भी यह पड़ोसी मूल्क अनगर्ल आरोपों लगा चुका है।
दुनिया जानती है कि हाफिज सईद कुख्यात आतंकी है। सईद का संगठन पाकिस्तान के भीतर बेहद मजबूत है। वह आतंकियों को तैयार करने में माहिर है। लश्कर-ए-तैयबा के सदस्य जम्मू-कश्मीर तक में आतंकवाद में लंबे वक्त से लिप्त हैं। यह संगठन पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में आतंकी शिविरों का संचालन भी कर रहा है। जहां युवाओं को लालच देकर अथवा डरा-धमका कर आतंक की राह पर चलने की ट्रेनिंग दी जाती है। आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के चक्कर में पाकिस्तान की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरंतर धूमिल हो रही है, मगर वह इन संगठनों पर लगाम कसने को राजी नहीं है। इसी कड़ी में पाकिस्तान के राष्ट्रपति डॉ. आरिफ अल्वी ने भी भारत के खिलाफ जहर उगला है। दरअसल डॉ. अल्वी ने तुर्की के सेना प्रमुख जनरल उमित दुंदार के साथ मुलाकात की है। इस दौरान पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने दावा किया कि भारत अफगानिस्तान के रास्ते पाकिस्तान में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। आतंकियों को प्रशिक्षण और आर्थिक मदद उपलब्ध करा रहा है। पाकिस्तानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे वक्त पर आया है जब दोनों देश मिलकर कई गुप्त रक्षा सहयोग कार्यक्रम चला रहे हैं।
पाकिस्तानी राष्ट्रपति ने भारत में परमाणु बम में प्रयुक्त यूरेनियम का अवैध व्यापार होने का आरोप लगाने के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को समाप्त करने का भी मुद्दा उठाया। पाकिस्तान और तुर्की के बीच पिछले कुछ समय में नजदीकी बढ़ी है। दरअसल तुर्की की इच्छा मुस्लिम देशों का खलीफा बनने की है। इसके लिए वह पाकिस्तान जैसे देशों के साथ अपनी दोस्ती को गाढ़ा कर रहा है। पाक को खुश करने के लिए तुर्की बार-बार भारत विरोधी बयानबाजी कर रहा है। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर भी तुर्की ने नाराजगी जाहिर की थी। इसके अलावा वह कश्मीर में माहौल खराब होने का दावा कर बाकी मूल्कों से इस मामले में दखल देने का अनुरोध करता रहा है। पाकिस्तान और तुर्की के बीच बढ़ते प्रेम पर ग्रीस के विशेषज्ञ भारत को आगाह कर चुके हैं। चर्चा है कि पाकिस्तान परमाणु बम और मिसाइल तकनीक को तुर्की को ट्रांसफर कर रहा है।
ग्रीस के विशेषज्ञों ने कहा है कि पाकिस्तान और तुर्की के मध्य इस दोस्ती से ग्रीस और भारत में आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा को बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया है। तुर्की, पाकिस्तानी और चीनी खुफिया एजेंसियां जम्मू-कश्मीर को अस्थिर करने के लिए एक साथ मिलकर काम कर रही हैं। ग्रीस के विशेषज्ञों ने इस मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति से भी ध्यान देने की अपील की है।
अफगानिस्तान से विदेशी सैनिकों की वापसी से तालिबान के बाद सबसे ज्यादा खुशी पाकिस्तान को हो रही है। चूंकि पाकिस्तान और तालिबान के घनिष्ट संबंध हैं। निकट भविष्य में वह तालिबान के साथ मिलकर भारत विरोधी कृत्यों को अंजाम दे सकता है। अफगानिस्तान के बदलते हालात को ध्यान में रखकर भारत भी अपनी कुटनीति में बदलाव कर रहा है। तालिबान को हमेशा नजरअंदाज करता रहा भारत अब कुछ नए कदम उठा रहा है। इसके चलते पिछले दिनों कतर में भारत के प्रतिनिधियों ने तालिबान के प्रतिनिधियों संग बातचीत की थी। इसकी जानकारी मिलने के बाद पाकिस्तान बौखला गया। वह कतई नहीं चाहता कि भारत की नजदीकी तालिबान के साथ बढ़ें। अफगानिस्तान में अमेरिका के नेतृत्व में नाटो की फौज को करीब 20 साल होने जा रहे हैं। तालिबान के खिलाफ अमेरिका को काफी कुछ गंवाना पड़ा है, मगर वह आज तक अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया। इसके पीछे भी पाकिस्तान की चाल रही है। यदि वह तालिबान की सपोर्ट न करता तो आज हालात कुछ और होते। अमेरिका भी इस बात को अच्छी तरह जानता है, मगर वह आगे अफगानिस्तान में रूककर अपनी सैन्य ऊर्जा, वक्त और पैसा बर्बाद करना नहीं चाहता। अमेरिका और तालिबान को वार्ता की मेज पर लाने में पाकिस्तान ने अह्म रोल निभाया था। वैसे अफगानिस्तान सरकार को पाकिस्तान पर रत्ती भर भरोसा नहीं है। तभी तो अफगानिस्तान के एनएसए निरंतर उसके खिलाफ बयान दे रहे हैं।
भारत को इस समय बेहद संभल कर और सावधानी पूर्वक चलने की जरूरत है। चीन और पाकिस्तान से मिल रही चुनौतियों के बीच अफगानिस्तान में तालिबान की मजबूती ने भारत की चिंता और बढ़ा दी है। चीन-पाकिस्तान की गतिविधियों पर पैनी नजर रखकर उचित कदम उठाने होंगे। तुर्की के साथ मिलकर भी पाकिस्तान भविष्य में चुनौतियां पेश कर सकता है। यानी भारत को अपनी रणनीति में व्यापक बदलाव लाना होगा। सभी जरूरी कदम समय रहते उठा लेने की आवश्यकता है। दुश्मन को कमजोर व कमतर आंकने की भूल भारी पड़ सकती है।