हम सभी को जीवन में सत्संग का आश्रय लेना चाहिए

उदय भूमि ब्यूरो, बरेली। आनंद आश्रम महोत्सव के प्रथम दिवस के सत्संग सभा की अध्यक्षता करते हुए श्री दैवी संपद् मंडल आश्रम रायबरेली से पधारे संस्था के प्रमुख श्री स्वामी ज्योतिर्मयानंद जी महाराज ने अपने उद्बोधन में उपस्थित भक्तों को संबोधित करते हुए संकेत किया दैवी सम्पद् मंडल आश्रम की स्थापना करने वाले महापुरुष ब्रह्मलीन श्री स्वामी सुखदेवानंद जी महाराज ने इस आश्रम की स्थापना और उसका नामकरण आनंद आश्रम रखने का मूल उद्देश्य सर्व भूतहिते रता:के उद्देश्य को लेकर इस मंडल की स्थापना हुई। संसार का प्रत्येक प्राणी जीवन में एकमात्र आनंद की खोज में ही है। आनंद एक ऐसा शब्द है जो जिसकी मांग मानव मात्र में है । अगर एक स्वान भी नींद से जगता है अंगड़ाई लेता है तो अंगड़ाई लेते हुए भी वह एक फुर्ती, एक आनंद की अनुभूति, उसके जीवन में भी होती है । वह उसके क्रियाकलापों से व्यक्त होता है हिंदी शब्दकोश में आज तक का कोई विलोम शब्द नहीं ढूंढने को नही मिला। इसलिए क्योंकि आनंद जीवन की एक मूल मांग है हम सभी भी आनंद ही चाहते हैं ,कई बार व्यवहार में देखने को आता है कि लोग आपस में झगड़ते हैं एक दूसरे पर अपशब्दों का प्रयोग करते हैं और उससे भी कहते हैं कि मुझे बड़ा सुकून मिला, बड़ा आनंद मिला। मूल में खोज तो आनंद की है हम जीवन में इस शब्द स्पर्श रूप रस गंध विषयों के संपर्क में आते ही उसके मूल में भी आनंद की खोज कर रहे हैं यह में बंधन का कारण हमारे लिए बनते हैं जो मात्र को इन पांच विषयों के माध्यम से उसे अनेक जन्मों तक इस संसार सरिता में ही उसे आने के लिए विवश होना पड़ता है फिर भी मानव की जो पूर्व संस्कारों के कारण उसका जो आकर्षण है। इन शब्द स्पर्श रूप रस गंध पंच विषयों की और स्वाभाविक होता है और हमारे संत महापुरुष हमें यही संदेश देते हैं कि जीवन में यदि इन सबसे ऊपर उठने का आया करेंगे जो हमारे जीवन का मूल उद्देश्य है उसकी प्राप्ति के लिए हमें उस मूल की ओर आगे बढऩा पड़ेगा। यह संसार तो फूल है एक उपवन है एक बाटिका है लेकिन इस संसार का जो मुख्य नियंता है वह मूल के रूप में है और जब हम उस मूल से जुड़ते हैं तो हमारा जीवन भी आनंद से भर जाता है और मूल ही वह परमात्मा है जिसके हम अंश हैं ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन अमल सहज सुख राशि हम उस परमात्मा के अंश जो परमात्मा आनंद स्वरूप है जो सुख रूप है जो अजन्मा है जो अविनाशी है जो परमात्मा सास्वत है जो हर कण में हर क्षण में है बस हमारी दृष्टि बदलने की आवश्यकता है और यह सत्संग महापुरुषों की वाणी हमारे जीवन में हमारी दृष्टि को बदल देता है और जब दृष्टि बदल जाती है अपने आप दिखाई पड़ती है इसलिए कहते हैं कि नजरें बदल गई तो नजारा बदल गया और किस्ती ने रुख बदला तो किनारा बदल गया। इसलिए हम आप सब को भी जीवन में सत्संग का आश्रय लेना चाहिए। यह सत्संग हमारी ऊपर की आवरण में परिवर्तन नहीं करता यह हमारे अन्तर मन को बदल देता है सोचने की दिशा को बदल देता है हमारे स्वभाव को बदलता है हमारे व्यवहार में परिवर्तन ला देता है वाणी की कर्कशता समाप्त हो जाती है, उस में मधुरता आ जाती है। लोगों के प्रति हमारा प्रेम जागृत होता है।