लेखक- राकेश कुमार भट्ट
(लेखक सामाजिक विश्लेषक है। डेढ दशक से प्रकृति, पर्यावरण और मानव संसाधन प्रबंधन क्षेत्र से जुड़े हुए है और कई शोध पत्र तैयार किया है। इन विषयों पर अक्सर लिखते रहते है। यह लेख उदय भूमि के लिए लिखा है)
देश में स्वच्छ पेयजल का संकट निरंतर गहरा रहा है। भविष्य में यह समस्या और विकराल रूप धारण कर सकती है। पानी के लिए तीसरा विश्व युद्ध होने की संभावना तक जाहिर की जा चुकी है। ऐसे में पानी के मोल को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पानी की एक-एक बूंद बहुमूल्य है। इसके बारे में प्रत्येक नागरिक को जागरूक होना पड़ेगा। भू-जल स्तर में सुधार के लिए भी आवश्यक कदम उठाने की जरूरत है। भू-जल प्रबंधन के लिए एकीकृत प्रयासों की जरूरत है।
भारत के विभिन्न हिस्सों में विविध और विशिष्ट प्रकार के पारंपरिक जल निकाय उपलब्ध है, जिन्हें सामान्यतया तालाब, झील, पोखर, ताल, आहर, बावड़ी, आदि के रूप में जाना जाता है। पानी एक दुर्लभ संसाधन है। इस संसाधन को संरक्षित करने की आवश्यकता है। इसका संरक्षण विभिन्न माध्यम से संभव है। दैनिक जीवन में घरेलू स्तर, कारखानों तथा कृषि के स्तर पर पानी के कुशल उपयोग से काफी मात्रा में जल बचा सकते हैं। अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण जल संरक्षण में अह्म भूमिका निभा सकता है। भारत सरकार ने कई नई नीतियां एवं नियामक बनाए हैं, जिनसे वर्षाजल संग्रहण तथा जल संरक्षण को बढ़ावा मिल रहा है।
भारत के सुरक्षित भविष्य के लिए जल निकायों का संरक्षण और संवर्धन जरूरी है, क्योंकि ये पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने और उन्हें बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे पीने के पानी और अन्य कार्यों हेतु जल स्रोत के रूप में कार्य करते हैं, भूजल पुनर्भरण करते हैं, बाढ़ की भयावहता को भी नियंत्रित करते हैं, जैव विविधता का समर्थन करते हैं और बड़ी संख्या में नागरिकों को आजीविका के अवसर भी प्रदान करते हैं।
भारत में पिछले कुछ दशकों में तेजी से शहरीकरण होने और अनियोजित विकास के कारण जल निकाय निरंतर और अविश्वसनीय तनाव में रहे हैं। मुंबई, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और चेन्नई में पिछले कुछ वर्षों में आई भयावह बाढ़ के प्रमुख कारण के रूप में जलाशयों का उपयोगी ना रहना मुख्य कारण रहा। इसके अलावा जल निकायों को अनुपचारित अपशिष्टों और सीवेज द्वारा भारी मात्रा में प्रदूषित भी किया जा रहा है। समकालीन शहरी भारत में जलाशयों की संख्या तेजी से घट रही है। इन जलाशयों की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में इस हद तक गिरावट आई है कि विभिन्न आर्थिक और पर्यावरणीय सेवाएं प्रदान करने की उनकी क्षमता कम हो गई है। हालांकि जलाशयों के संरक्षण और बहाली के लिए पर्याप्त नीतियां और अधिनियम हैं, लेकिन मेरी नजर में वे अपर्याप्त और अप्रभावी हैं।
जलाशयों की समस्या की गंभीरता को समझ कर केंद्र सरकार ने 2005 में पारंपरिक जल निकायों के व्यापक सुधार और बहाली के उद्देश्यों के साथ जल निकायों की मरम्मत, नवीनीकरण और बहाली की योजना शुरू की थी। हालांकि इस संबंध में धरातल पर कुछ खास और प्रभावी देखने को नहीं मिला है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि शहरी नियोजन शहर के भू-भाग के साथ अधिक गंभीर रूप से जुड़ा है, तो स्थानीय जलाशयों और झीलों के इतिहास, सार्थक सामुदायिक जुड़ाव और जल निकायों के स्वामित्व के बारे में ज्ञान के प्रसार के साथ शहरों में पानी की समस्या और प्रबंधन को कम किया जा सकता है। इस क्रम में जल शक्ति अभियान, जल जीवन मिशन की घोषणा, नए जल शक्ति मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया एक समयबद्ध और एक स्वागत योग्य कदम है।
दिल्ली को झीलों का शहर बनाने के लिए 201 जलाशयों के कायाकल्प को अंतिम रूप दिया गया है। इनमें से दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) 155 निकायों को पुनर्जीवित करने की योजना बना रहा है, जबकि बाढ़ और सिंचाई विभाग 46 को पुनर्जीवित करेगा। दिल्ली सरकार द्वारा वेटलैंड्स अथॉरिटी की स्थापना प्राकृतिक जल निकायों को अधिसूचित और संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, मगर जलाशयों के पुनरुद्धार के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, यह समझना महत्वपूर्ण है कि एक समाधान सभी जलाशयों में फिट नहीं हो सकता है। जलाशयों की सफलता का परीक्षण आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक तीनों मोर्चों पर किया जाना चाहिए। सामाजिक मोर्चे खासकर स्थानीय समुदाय के बीच परियोजना के पर्यावरणीय लाभों का बेहतर प्रचार, आजीविका प्रबंधन और पर्यावरण जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है और स्थानीय नागरिकों को संसाधनों का सफलतापूर्वक उपयोग करने और जल निकायों के संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए अन्य हितधारकों के साथ सहयोग करने हेतु भी प्रोत्साहित करना होगा।
जलाशयों पर अतिक्रमण हटाने के लिए सख्त विधिक कार्रवाई की जाए। इन जलाशयों को गहरा करने, साफ करने और अतिक्रमण से बचाने के लिए गंभीर और त्वरित कार्रवाई समय की मांग है। केंद्रीय जल आयोग द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार अगर वर्षा जल का उचित संचयन किया जाए तो 4,000 अरब घन मीटर की वार्षिक वर्षा से 3,000 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी की वार्षिक आवश्यकता को प्रबंधित किया जा सकता है, लेकिन हम वर्षा जल का केवल लग्भग आठ प्रतिशत तक ही संचयन कर पा रहे हैं, जो दुनिया में सबसे कम है। इस हेतु ड्रिप सिंचाई का अभ्यास का भी उपयोग किया जा सकता है।
कृषि फसलों को सफलतापूर्वक उगाने के लिए ड्रिप सिंचाई पद्धति को अधिक प्रभावी पाया गया है। इस प्रणाली से 70 प्रतिशत पानी बचाने में मदद के अलावा 30-40 प्रतिशत बिजली की भी बचत होती है। इन सबसे ऊपर लगभग 30-90 प्रतिशत की फसल उत्पादकता में वृद्धि के माध्यम से कृषि समुदाय की आय भी दोगुनी हो जाती है। भारत में घरेलू अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण और पुन: उपयोग ठीक से नहीं किया जाता है, इसलिए लगभग 80 प्रतिशत पानी को सीवेज के माध्यम से नदियों और नालों जैसे जल निकायों में मिलाने की अनुमति दी जाती है।
गंगा, यमुना और कावेरी सहित कई नदियां, पेयजल आपूर्ति प्रदान करती हैं, परंतु कारखानों और घरों द्वारा छोड़े गए अपशिष्टों, सीवेज और प्लास्टिक कचरे से प्रदूषित भी होती हैं। भारत के किसानों और जनता को जल संचयन के तरीके भी सिखाए जाने चाहिए। पिछले साल नीति आयोग द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के 21 शहर आने वाले कुछ समय मे भूजल से बाहर हो सकते हैं। इसलिए यह उचित समय है कि सरकार नागरिकों की पानी की आवश्यकता को पूरा करने हेतु ससमय, आवश्यक और प्रभावी प्रयास करे।
















