देश में बढ़ती महंगाई पर हाय-तौवा मची हुई है। सत्ता पक्ष के खिलाफ विपक्ष ने आक्रामक रूख अपना रखा है। पहले कोरोना संक्रमण की मार, फिर बेरोजगारी और अब महंगाई ने आम आदमी का जीना मुहाल कर दिया है। पेट्रोल-डीजल के दाम रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुके हैं। ऐसे में निरंतर आलोचना का सामना कर रही सरकार ने दीपावली पर्व से ऐन पहले पेट्रोल-डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी में क्रमश: पांच रुपए और दस रुपए प्रति लीटर कटौती की है। इससे लोगों को तत्काल कुछ राहत जरूर मिली है, मगर सरकार के इस कदम का वैसा उत्साहपूर्ण स्वागत नहीं हो सका है, जैसी उम्मीद की जा रही थी। कारण संभवत: यह है कि आमजन के लिए इस फैसले को सरकार की संवेदनशीलता से जोड़कर देखना संभव नहीं हो पा रहा।
पिछले काफी वक्त से पेट्रोल एवं डीजल की कीमतों का निरंतर बढ़ता भार आमजन के लिए जीना मुश्किल किए हुए था, मगर सरकार ने कभी यह संकेत नहीं दिया कि वह इसे लेकर चिंतित है अथवा इसे कम करने के उपायों पर विचार कर रही है। सरकार का यह निर्णय कुछ विधान सभा सीट और लोकसभा सीट पर उप-चुनाव के परिणाम सामने सामने आने के बाद आया है। चुनावी नतीजों को कांग्रेस के लिए उत्साहवर्धक और भाजपा के लिए चिंताजनक माना गया। इससे यह मैसेज गया कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड इत्यादि राज्यों में अगले सााल होने वाले विधान सभा चुनाव में पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित है।
पेट्रोल-डीजल के दामों में कमी करने का ताजा निर्णय इसी चुनावी चिंता से उपजा है। इसका मतलब यह माना गया कि इन राज्यों में चुनाव होने पर पेट्रोल एवं डीजल के भाव पुन: ऊपर का रूख कर लेंगे। दूसरी बात यह कि पिछले कुछ समय में पेट्रोल-डीजल के दाम में जो असाधारण वृद्धि हुई है, उसके मुकाबले यह कटौती बेहद कम है। 2021 में अभी तक पेट्रोल-डीजल के भाव लगभग अट्ठाईस रुपए और छब्बीस रुपए प्रति लीटर बढ़ाए जा चुके हैं। इस मुकाबले पांच रुपए और दस रुपए प्रति लीटर की कटौती को राहत माना भी जाए तो कैसे? खासकर ऐसे समय में जब इसके पीछे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों से ज्यादा बड़ी भूमिका एक्साइज ड्यूटी की हो।
ताजा कटौती के बाद भी पेट्रोल एवं डीजल पर प्रति लीटर काफी एक्साइज ड्यूटी लगती है, जो पिछली सरकारों के कार्यकाल के दरम्यान लगने वाली ड्यूटी के मुकाबले ज्यादा है। वैसे मौजूदा हालात और चुनौतियों की तुलना पिछली सरकारों के कार्यकाल से करना उचित नहीं है, मगर पेट्रोल-डीजल के ऊंचे भाव न सिर्फ शहरों व गांवों के आम वाहन स्वामियों को प्रभावित करते हैं बल्कि फसलों की सिंचाई और माल ढुलाई का खर्च बढ़ाकर आम तौर पर महंगाई का स्तर भी बढ़ा देते हैं। अलबत्ता सरकार को पेट्रोल-डीजल के दाम में और और कमी लाने पर विचार करना चाहिए। दीपावली पर्व के पहले केंद्र और मध्य प्रदेश की सरकार ने सेंट्रल एक्साइज और वैट में कमी कर पेट्रोल एवं डीजल के दामों में काफी राहत पहुंचाई, मगर यह राहत पेट्रोल पंप कारोबारियों को भारी पड़ गई।
प्रत्येक पेट्रोल पंप कारोबारी को काफी नुकसान उठाना पड़ा है। भारत अपनी आवश्यकता का कच्चा तेल सऊदी अरब, इराक और अमेरिका से आयात करता है। सऊदी अरब जहां भारत के लिए पारंपरिक तेल निर्यातक देश रहा, वहीं अमेरिका पिछले दशक में इसमें बाजी मार रहा है। दरअसल तेल बाजार में पिछले एक दशक के दरम्यान काफी परिवर्तन आया है। सऊदी के वर्चस्व में सेंधमारी कर अमेरिका में भी शेल इंडस्ट्री के जरिए कच्चे तेल के उत्पादन में भारी वृद्धि हुई है। रूस इसमें पहले से ही आगे रहा है। यानी सऊदी, रूस और अमेरिका दुनियाभर को सबसे ज्यादा तेल बेच रहे हैं। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक भारत अपनी आवश्यक का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल मध्य पूर्व और खाड़ी देशों से खरीदता है।
पिछले कुछ दिनों में कच्चे तेल में उछाल से भारत का तेल आयात बिल कई गुना बढ़ गया है। इससे सरकार की मुश्किलें भी बढ़ी है। सितंबर में भारत का व्यापार घाटा बढ़कर 22.6 अरब डॉलर हो गया, जो कम से कम 14 साल में सबसे अधिक है। भारत का व्यापार घाटा बढ़ने का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमत में उछाल आना है। भारत तेल आयात बिल को घटाने के लिए सरकारी और निजी रिफाइनरी कंपनियों के साथ नया गठजोड़ कायम करने पर काम कर रहा है। शुरूआत में रिफाइनरी समूह पंद्रह में एक बार बैठक करेगा और कच्चे तेल की खरीद पर अपनी योजना का आदान-प्रदान करेगा। सस्ते कच्चे तेल की खरीदारी के लिए कंपनियां ज्वाइंट रणनीति बना सकती हैं और जहां भी संभव हो वह संयुक्त बातचीत के लिए जा सकती हैं।
भारत की रिफाइनरी कंपनियां आपूर्ति में विविधीकरण के लिए पश्चिम एशिया के बाहर से ज्यादा तेल की खरीद पर बल दे रही हैं। भारत की प्राथमिकता सस्ती दरों पर आपूर्ति प्राप्त करने की है। यह कोई भी देश हो सकता है। फिलहाल भारत, सऊदी अरब के ऊपर अमेरिका को तवज्जो दे रहा है। अलबत्ता तेल के इस खेल को सरकार ज्यादा सरल बनाने की कोशिश में है ताकि न सरकार की परेशानी बढ़े और ना जनता को बार-बार महंगे तेल की मार से दो-चार होना पड़े। देश में सीएनजी संचालित वाहनों के बाद इलैक्ट्रिक वाहनों पर भी निरंतर जोर दिया जा रहा है। इलैक्ट्रिक वाहनों की बिक्री भी बढ़ी हुई है। अगले कुछ साल में इलैक्ट्रिक वाहनों का बाजार रफ्तार पकड़ सकता है। चूंकि महंगे र्इंधन से बचने के लिए नागरिक अब इलैक्ट्रिक वाहनों में रूचि दिखा रहे हैं।
















