रक्षक की भूमिका कब निभाएगी police ?

भारत में police की खराब कार्यशैली पर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। पुलिस में सुधार के लिए समय-समय पर कदम उठाए जाते रहे हैं। इसके बावजूद सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ पाते हैं। खाकी पर अक्सर जनता की रक्षक की बजाए भक्षक होने की तोहमत भी लगती रहती है। पुलिस की कारगुजारियों पर यदि लिखना शुरू कर दिया जाए तो कागज कम पड़ जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट के अलावा विभिन्न राज्यों की हाईकोर्ट अक्सर पुलिस को कटघरे में खड़ा करती रही हैं। सिस्टम में सुधार लाने को आदेश होते रहते हैं, मगर स्थिति ढाक के तीन पात की रहती है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमन्ना ने police के काम-काज के तरीकों पर गंभीर टिप्पणी कर सोचने पर मजबूर कर दिया है। चीफ जस्टिस की टिप्पणी को कमतर नहीं आंका जानी चाहिए। उन्होंने एक बयान में कहा है कि पुलिस स्टेशन मानवाधिकारों और मानवीय सम्मान के लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमन्ना का यह बयान ऐसे वक्त पर आया है जब देश में आजादी की 75वीं वर्षगांठ को धूमधाम से मनाने की तैयारियां चल रही हैं। देश एवं समाज में police का महत्वपूर्ण योगदान होता है। पुलिस के बगैर समाज में शांति एवं कानून व्यवस्था को स्थापित रखने की कल्पना करना भी संभव नहीं है।

police को जनता का रक्षक माना जाता है। खाकी के कंधों पर अह्म दायित्व को नकारा नहीं जा सकता, मगर ऐसा क्या कारण है कि आजादी के इतने साल बाद भी देश में आमजन का पुलिस पर भरोसा नहीं बढ़ पाया है। क्यूं चीफ जस्टिस को खाकी की कार्यशैली पर नाराजगी जतानी पड़ी है। पुलिस स्टेशन यदि मानवाधिकार और मानवीय सम्मान को तरजीह नहीं देंगे तो फरियादियों को आखिर न्याय कैसे मिल सकेगा? दरअसल पुलिस हिरासत में नागरिकों पर अत्याचार के मामले तेजी से बढ़े हैं। इसकी तस्दीक राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों से होती है।

NCRB के रिकॉर्ड मुताबिक पिछले 10 साल में (नवंबर 2020 तक) देश में पुलिस हिरासत में कुल 1004 मौतें दर्ज की गईं थी। इनमें से 69 प्रतिशत को या तो प्राकृतिक कारणों से हुई मौत अथवा आत्महत्या बताया गया है। पुलिस हिरासत में पूछताछ के दौरान किसी नागरिक की मौत होना कोई नई बात नहीं है। अपराध से जुड़े किसी भी मामले में police आमतौर पर संदिग्ध को पूछताछ के लिए बुलाती है। बाद में नियम-कानूनों को ताक पर रखकर संदिग्ध को प्रताडि़त करना आम बात है। पुलिस हिरासत में किसी को रखने और पूछताछ के लिए भी जरूरी नियम निर्धारित हैं, मगर इन नियमों की पुलिस स्टेशनों में धज्जियां उड़ती रहती हैं।

मानवाधिकार और मानवीय सम्मान के प्रति police कभी गंभीर दिखाई नहीं देती। पुलिस अपनी खराब और बदमिजाज छवि से आज तक बाहर नहीं निकल पाई है। जुल्म का शिकार होने के बाद भी पीडि़त को आमतौर पर चौकी अथवा थाने जाकर फरियाद करने से डर लगता है। इसका कारण पुलिस का रूखा व्यवहार है। चौकी-थानों में फरियादियों से सीधे मुंह police बात नहीं करती। गंभीर से गंभीर प्रकरण में भी पुलिस की लापरवाही और उदासीन भरा रवैया देखने को मिलता है। फरियादी के साथ गाली-गलौच, अभद्रता एवं मारपीट तक कर देना पुलिस की आदतों में शुमार है। कई बार ये भी देखा गया है कि किसी मामले में पुलिस खुद जज की भूमिका में आ जाती है। तथ्यों की जांच-पड़ताल किए बगैर वह उलटा फरियादी को सवालों के कटघरे में खड़ा कर मायूस कर देती है।

पुलिस विभाग में सुविधा शुल्क और सिफारिश के बगैर काम होना भी संभव नहीं है। पुलिस के शीर्ष अफसर बेशक समय-समय पर लिखित एवं मौखिक आदेश कर मातहतों को फरियादियों के प्रति अच्छा बर्ताव करने को कहें, मगर ढर्रा नहीं सुधर पाता है। न्याय मिलने की उम्मीद धूमिल पड़ती देख पीडि़त अक्सर पीछे हटने को मजबूर हो जाते हैं। वह या तो शिकायत को वापस ले लेते हैं अथवा आरोपी के साथ समझौता करने को विवश होते हैं। police पर सत्ता पक्ष के दबाव में काम करने के आरोप भी लगते रहते हैं। यह आरोपी निराधार नहीं हैं। जब कोई राजनीतिक दल सत्ता में आता है तो वह पुलिस का इस्तेमाल अपने हिसाब से करता है।

पुलिस को स्वतंत्र बॉडी बनाने की दिशा में राजनीतिक दल गंभीर नहीं हैं। नतीजन सत्ता में आने पर हर कोई दल अपने हिसाब से खाकी का प्रयोग करता है। पुलिस महकमे में व्यापक स्तर पर बदलाव की जरूरत है। इसके लिए संसद को आगे आना पड़ेगा। सभी राजनीतिक दलों को संयुक्त प्रस्ताव लाकर पुलिस की कार्यशैली को सुधारने की दिशा में काम करना होगा। अन्यथा हालात में कोई बदलाव आने की संभावना दूर-दूर तक नहीं है। इस कारण अपने कारनामों के चलते खाकी निरंतर बदनाम होती रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की चिंता को समझने की आवश्यता है।

police में सुधार कर बड़ी कामयाबी पाई जा सकती है। मौजूदा वक्त में पुलिस को स्मार्ट, व्यवहार कुशल एवं कर्तव्यों के प्रति जबावदेह बनाकर काफी कुछ हासिल किया जा सकता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में police को मनमानी करने की छूट देना कतई सही नहीं है। इस विभाग के मुखिया से लेकर निचले पायदान तक के कर्मचारी को उन बातों का ध्यान रखना और पालन करना चाहिए, जो उन्होंने सेवा में आने के दौरान शपथ पूर्वक ग्रहण की हैं। पुलिस के शीर्ष अधिकारियों को भी आत्ममंथन करने की जरूरत है। विभाग की छवि को सुधारने के लिए कौन-कौन से जरूरी कदम उठाए जाएंगे, इस पर विचार कर अमल करना होगा। अन्यथा police की वर्दी पर दाग लगने का सिलसिला जारी रहेगा। पुलिस कर्मी भी देश एवं समाज का अभिन्न अंग हैं। यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता है कि जैसा समाज होगा, वैसी पुलिस होगी।