कूड़े से बोतल, कोड भी नकली… फिर भी बिकती थी महंगी शराब: लखनऊ में नकली शराब का भंडाफोड़

• हरियाणा से सस्ती शराब लाकर यूपी की महंगी बोतलों में भरकर बेच रहे थे जालसाज
• 1.50 लाख रुपये की हरियाणा शराब समेत तीन तस्कर गिरफ्तार  

उदय भूमि संवाददाता
लखनऊ। राजधानी लखनऊ में आबकारी विभाग ने एक बार फिर अवैध शराब के कारोबार पर सटीक और साहसिक वार करते हुए एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश किया है। यह कार्रवाई किसी सामान्य छापे से कहीं अधिक थी, क्योंकि इससे न सिर्फ हरियाणा से सस्ती शराब लाकर उसे यूपी की महंगी शराब में बदलने की साजिश का खुलासा हुआ, बल्कि एक पूरे नकली शराब उद्योग का भंडाफोड़ भी हुआ है, जो कई जिलों में जहर घोलने की तैयारी में था। पकड़े गए आरोपियों ने हरियाणा से बेहद सस्ती शराब खरीदकर एक गुप्त ठिकाने पर उसकी प्रोसेसिंग कर उसे यूपी की महंगी ब्रांड जैसे ब्लेंडर्स प्राइड और रॉकफोर्ड की खाली बोतलों में भरते थे। इसके लिए कबाड़ी से पुरानी बोतलें, ढक्कन, और नकली क्यूआर कोड तैयार किए जाते थे। इसके बाद यह शराब लखनऊ के बाहर दूसरे जिलों में एमआरपी से कुछ कम दर पर बेची जाती थी, ताकि मुनाफा बना रहे और संदेह भी न हो।
इस गिरोह की सबसे खतरनाक बात यह थी कि इसमें हरियाणा, दिल्ली और लखनऊ के अपराधियों की जालसाजी का त्रिकोण बना हुआ था, जो काफी समय से यह धंधा चला रहे थे। इस कार्रवाई की शुरुआत तब हुई जब आबकारी विभाग को गुप्त सूचना मिली कि एक वैगनार कार में हरियाणा से शराब की खेप लखनऊ लाई जा रही है। सूचना पर तत्परता से कार्रवाई करते हुए आबकारी निरीक्षक शिखर मल्ल, स्थानीय पुलिस व क्राइम ब्रांच की टीम ने यादव चौराहे पर चेकिंग शुरू की। जैसे ही संदिग्ध कार को रोकने का प्रयास किया गया, वाहन चालक भागने लगा, लेकिन घेराबंदी कर कार को रोक लिया गया। कार की तलाशी के दौरान 641 बोतलें रॉयल स्टैग, इम्पीरियल ब्लू और 8पीएम ब्रांड की शराब, 4566 नकली क्यूआर कोड, 402 खाली बोतलें और 1343 ढक्कन बरामद हुए। पकड़ी गई शराब की कीमत करीब 1.50 लाख रुपये है।
यह सारी सामग्री देखकर साफ हो गया कि यह तस्करी नहीं बल्कि एक संगठित फर्जी ब्रांडिंग फैक्ट्री चल रही थी। पुलिस ने मौके से लखनऊ निवासी विशाल जायसवाल, पंकज सिंह और दिल्ली निवासी अजय जायसवाल को गिरफ्तार किया। इन सभी के खिलाफ आबकारी अधिनियम के अंतर्गत सख्त कार्रवाई कर जेल भेजा गया है। पूछताछ में यह सामने आया है कि आरोपी पहले लखनऊ से दिल्ली जाते थे, वहां से अजय को साथ लेकर हरियाणा जाकर शराब की सस्ती पेटियां खरीदते थे और उन्हें कार में छिपाकर वापस लाते थे। इसके बाद नकली क्यूआर कोड और महंगी ब्रांड की बोतलों का उपयोग कर शराब को नया रूप दिया जाता था और अन्य जनपदों में भेजा जाता था।
जिला आबकारी अधिकारी करुणेन्द्र सिंह ने इस सफलता को टीम के दृढ़ निश्चय, त्वरित सूचना संकलन और समन्वित कार्रवाई का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि लखनऊ सहित पूरे जिले में अवैध शराब पर पूरी तरह से शिकंजा कसा जा रहा है और सभी आबकारी निरीक्षकों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में लाइसेंसी दुकानों पर भी निगरानी बढ़ाएं और अवैध गतिविधियों को किसी भी स्तर पर बर्दाश्त न करें। इस बड़ी कार्रवाई ने न केवल एक शराब माफिया गिरोह को ध्वस्त किया है, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक चेतावनी भी दी है कि अब नकली शराब के कारोबार के लिए उत्तर प्रदेश में कोई जगह नहीं है। यह मामला प्रदेश की कानून व्यवस्था की तत्परता और आबकारी विभाग की सतर्कता का जीता-जागता प्रमाण है। अगर यह गिरोह पकड़ा न जाता, तो जहरीली शराब कई जिलों में पहुंचकर जनजीवन के लिए खतरा बन सकती थी। अब जब यह नेटवर्क उजागर हो चुका है, तो यह उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में ऐसे अपराधियों पर और भी कड़ी निगरानी रखी जाएगी और जनता को सुरक्षित व शुद्ध उत्पाद मिल सकेंगे।
तरीका था हाईटेक, इरादा था जहरीली कमाई
पकड़े गए तस्कर हरियाणा से सस्ती शराब लाकर, कबाड़ी से यूपी की महंगी ब्रांड की खाली बोतलें व ढक्कन खरीदते, फिर नकली क्यूआर कोड तैयार कर यूपी की असली शराब का स्वरूप दे देते थे। यह पूरी कार्रवाई दिल्ली में नेटवर्किंग, हरियाणा से खरीद, और लखनऊ में प्रोसेसिंग व डिस्ट्रीब्यूशन के तौर पर की जाती थी। ये शराबें लखनऊ में नहीं, बल्कि प्रदेश के अन्य जिलों में एमआरपी से 100 रुपये कम कीमत पर बेची जाती थीं, ताकि दुकानदार मोटा मुनाफा कमा सकें और सवाल न उठें।
शराब की आड़ में जहर परोसने की थी तैयारी
अधिकारियों ने आशंका जताई कि यदि यह शराब बिना रोके बाजार में पहुंचती, तो इसका सेवन लोगों की सेहत के लिए घातक साबित हो सकता था। शराब के मिलावटी होने की आशंका को लेकर विभागीय जांच भी शुरू कर दी गई है।
तिनके से जाल तक टूटा शराब माफिया का तंत्र
गुरुवार को आबकारी विभाग को गुप्त सूचना मिली कि हरियाणा से शराब की एक वैगनआर कार लखनऊ आ रही है। तत्काल आबकारी निरीक्षक शिखर मल्ल, थाना पुलिस, और क्राइम ब्रांच की टीम सक्रिय हुई और यादव चौराहे पर सघन चेकिंग शुरू की गई। जैसे ही संदिग्ध कार को रोका गया, चालक भागने की कोशिश में लग गया, लेकिन चारों तरफ से घेराबंदी कर उसे पकड़ लिया गया। जब कार की तलाशी ली गई तो विभाग के होश उड़ गए—कार चलता-फिरता शराब कारखाना बन चुकी थी।
मिलावटखोरी से लेकर माफिया मॉडल तक
• यह मामला साफ दर्शाता है कि माफिया मानसिकता अब तकनीक और ब्रांडिंग का भी दुरुपयोग कर रही है
• नकली शराब के कारोबार में जनस्वास्थ्य, राज्य राजस्व, और युवाओं के भविष्य तीनों दांव पर लग जाते हैं
• विभाग की कार्रवाई से ये संकेत भी स्पष्ट हुए कि प्रदेश अब संगठित अवैध कारोबार पर और तीव्रता से हमला करेगा