-पत्र लिखकर अधिकारियों ने की जल्दी रिपोर्ट भेजे जाने की मांग
-कार्रवाई के बाद भी मिलावटखोरों पर कैसे कसा जाएगा शिकंजा
गाजियाबाद। खाद्य पदार्थों में मिलावटखोरों पर शिकंजा कसने के लिए खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन द्वारा बेशक लगातार छापेमार कार्रवाई की जा रही हो। मगर खाद्य सामग्री के सैंपल लेने के बाद इनकी जांच में लैब से रिपोर्ट आने में लग रहे समय की वजह से विभाग के अधिकारियों के भी हाथ बांध दिए हैं। लैब की देरी से रिपोर्ट मिलने की वजह से खाद्य सुरक्षा विभाग मिलावटखोरों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। फिलहाल लैब का पत्र लिखकर अधिकारियों ने जल्दी रिपोर्ट भेजे जाने की मांग की है।
सहायक आयुक्त खाद्य एवं सुरक्षा विनीत कुमार ने बताया कि खाद्यय सामग्री में मिलावटखोरी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सैंपल लेकर लैब को भेजे जा रहे है। मगर इनके खिलाफ कार्रवाई के लिए लैब की रिपोर्ट का इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में अधिकतर मामलों मेें ज्यादा समय लगने की वजह से इन पर जुर्माना लगाने समेत अन्य कार्रवाई की प्रक्रिया भी धीमी हो रही है। इसलिए लैब से जल्द रिपोर्ट भेजने की मांग की गई हैं।
दरअसल, खाद्य सुरक्षा विभाग द्वारा समय-समय पर खाने-पीने से लेकर मिठाई आदि में मिलावटखोरी रोकने के लिए छापेमार कार्रवाई की जाती है। कार्रवाई में सफाई,रखरखाव की जांच के अलावा प्रमुख तौर पर संदिग्ध मिलावटी सामान के नमूनों को जमा करके उन्हें जांच के लिए विभाग की लैब में भेजा जाता है। लैब की जांच की रिपोर्ट के आधार पर ही मिलावट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाती है। ऐसे में लैब से रिपोर्ट आने में आमतौर पर तीन से चार महीने का समय लगता है। रिपोर्ट मिलने में अधिक समय लगने के कारण विभाग द्वारा समय पर कार्रवाई नहीं कर पता है। इस अंतराल में आरोपी अपने बचाव का उपाय करने लगते हैं। खाद्य सुरक्षा विभाग के अधिकारी रिपोर्ट जल्दी भेजे जाने की मांग करते हुए लैब को कई बार पत्र लिख चुके हैं। लेकिन इस संबंध में अभी तक कोई सकारात्मक जवाब नहीं आया है।
दुकानों से लिए गए सैंपल की जांच में नहीं बल्कि विभागीय लैब संवेदनशील मामलों की जांच में भी अधिक समय लगाती है। नवरात्रों में कुट्टू के आटा खाने के चलते दर्जनों लोगों को बीमार पडऩे का मामला हो या फिर लोनी में मिड डे मील का दूध पीने से बीमार पड़े बच्चों के मामले की रिपोर्ट के लिए खाद्य सुरक्षा विभाग अभी भी इंतजार कर रहा है। यदि रिपोर्ट विभाग को मिल गई होती तो दोषियों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की कार्रवाई कर सकते थे। महीनों के इंतजार का खामियाजा कार्रवाई होने में देरी के रूप में उठाना पड़ता है। जांच की रिपोर्ट में अधिक समय लगने का लाभ कई बार मिलावटखोरी करने वाले लोग उठा लेते हैं। देखने में आया है कि वह अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके मिलावटखोर पीडि़तों को अपने पक्ष में कर लेते हैं। इसके अलावा अपने खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होने तक अंडर ग्राउंड हो जाते हैं। ऐसे कई मामलों में इन मिलावटखोरों की तलाश फिलहाल भी की जा रही है।
















