-राजनीति में गिरती भाषा और मर्यादा पर रविंद्र तिवारी की कड़ी टिप्पणी
-नफरत, अपमान और गुंडागर्दी की भाषा लोकतंत्र और समाज दोनों के लिए घातक: रविन्द्र तिवारी
उदय भूमि संवाददाता
गाजियाबाद। आज सार्वजनिक जीवन में मर्यादा, संयम और शालीन भाषा लगातार कमजोर होती जा रही है। राजनीति में बढ़ती तू-तड़क, अपमानजनक शब्दावली और अहंकार से भरा आचरण न केवल राजनीतिक स्तर को गिरा रहा है, बल्कि समाज को भी भ्रमित और विभाजित कर रहा है। वित्तीय सलाहकार रविंद्र तिवारी ने वर्तमान राजनीतिक वातावरण पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश की संस्कृति और परंपरा हमेशा से संयम, संस्कार और आपसी सम्मान की प्रतीक रही है। यदि माननीय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसे अनुशासित और मूल्य आधारित नेतृत्व इस प्रकार के दृश्य देख रहे होंगे, तो निश्चित ही उन्हें भी पीड़ा होती होगी। ऐसी भाषा और व्यवहार प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के विपरीत हैं और जनता के विश्वास को कमजोर करते हैं। उन्होंने किसी भी समाज या बिरादरी के विरुद्ध नफरत फैलाने की प्रवृत्ति को अत्यंत निंदनीय बताया।
विशेष रूप से ब्राह्मण समाज के प्रति अशोभनीय भाषा के प्रयोग पर आपत्ति जताते हुए उन्होंने कहा कि यह न केवल सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि राजनीतिक अपरिपक्वता को भी उजागर करता है। सत्ता और सुरक्षा के दिखावे में यदि लोग स्वयं को अजेय समझने लगते हैं, तो उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि आम जनता उनके बारे में क्या सोच रही है और उनके बच्चे इस आचरण से क्या सीख रहे हैं। रविंद्र तिवारी ने कहा कि आज की राजनीति में प्रयुक्त गुंडागर्दी की भाषा युवाओं को गलत संदेश दे रही है। जिन महापुरुषों और वरिष्ठ नेताओं का समाज में कभी सम्मान रहा है, उनके लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग-यहां तक की उनके निधन के बाद-नैतिक पतन का स्पष्ट संकेत है। यह न तो राजनीति की गरिमा के अनुरूप है और न ही सामाजिक मूल्यों के।
उन्होंने कहा कि केवल औपचारिक सम्मान दिखाना और भीतर से अपमान करना राजनीति नहीं, बल्कि ढोंग है। ऐसे लोगों से दूरी बनाना ही समाज के हित में है। दुआ-सलाम अपनी जगह हो सकती है, लेकिन आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोगों के साथ खड़ा होना अंतत: समाज की नजरों में विश्वसनीयता को समाप्त कर देता है। जो लोग उनके साथ चलते हैं, उन्हें भी उसी दृष्टि से देखा जाता है। अपने बयान के अंत में वित्तीय सलाहकार रविंद्र तिवारी ने कहा कि आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता पहचान, विवेक और मर्यादा की है। यदि राजनीति को सच में जनसेवा का माध्यम बनाना है, तो भाषा, व्यवहार और सोच में शुद्धता लानी होगी। तभी लोकतंत्र मजबूत होगा और समाज सही दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
















