एचआईएमटी ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन्स में ‘मंथन’ संगोष्ठी, शिक्षा में अनुशासन और काउंसलिंग पर हुआ गहन विमर्श

-अनुशासन देता है दिशा, काउंसलिंग देती है सहारा और नैतिकता तय करती है जीवन का उद्देश्य: एच. एस. बंसल
-देशभर के शिक्षाविदों व विधि विशेषज्ञों ने छात्रों के व्यवहार एवं शैक्षिक परिणामों पर रखे विचार
-अनुशासन को शिक्षा की नींव और काउंसलिंग को सफलता का मार्गदर्शक बताया
-विद्वानों का सम्मान, धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का गरिमामय समापन

उदय भूमि संवाददाता
ग्रेटर नोएडा। एचआईएमटी ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन्स, ग्रेटर नोएडा में शुक्रवार को आयोजित वार्षिक संगोष्ठी  ‘मंथन’ का भव्य एवं सफल आयोजन किया गया। शिक्षा जगत के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, अधिवक्ताओं, शोधकर्ताओं तथा अकादमिक विशेषज्ञों की उपस्थिति में आयोजित इस संगोष्ठी ने शिक्षा प्रणाली में अनुशासन, काउंसलिंग और नैतिक मूल्यों की प्रासंगिकता पर सार्थक संवाद का मंच प्रदान किया। इस वर्ष संगोष्ठी का केंद्रीय विषय  ‘शिक्षा में अनुशासन एवं काउंसलिंग का छात्रों के व्यवहार व उनके शैक्षिक परिणाम पर प्रभाव’ रहा, जिस पर विभिन्न वक्ताओं ने गहन विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का शुभारंभ संस्थान के चेयरमैन एच. एस. बंसल के स्वागत संबोधन से हुआ। उन्होंने शिक्षा को केवल ज्ञान प्राप्ति का माध्यम न मानते हुए उसे व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया बताया। अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि अनुशासन व्यक्ति को संरचना प्रदान करता है, काउंसलिंग सहयोग और मार्गदर्शन देती है, जबकि नैतिकता जीवन को उद्देश्य प्रदान करती है।

उनके वक्तव्य ने संगोष्ठी के मूल उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उपस्थित शिक्षाविदों एवं छात्रों को प्रेरित किया। इस अवसर पर संस्थान के सचिव अनिल कुमार बंसल तथा संयुक्त सचिव श्री अनमोल बंसल ने अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि शिक्षा संस्थानों की जिम्मेदारी केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं बल्कि विद्यार्थियों को जीवन के लिए तैयार करना भी है। उन्होंने ऐसे संवादात्मक आयोजनों को विद्यार्थियों के मानसिक, सामाजिक और बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत आवश्यक बताया। ग्रुप डायरेक्टर प्रो. (डॉ.) सुधीर कुमार ने अपने उद्घाटन भाषण में अनुशासन को शिक्षा व्यवस्था का मूल आधार बताया। उन्होंने कहा कि बिना अनुशासन के ज्ञान अधूरा रह जाता है और बिना दिशा के प्रतिभा भटक सकती है। उन्होंने शिक्षकों से छात्रों के भीतर सकारात्मक ऊर्जा विकसित करने तथा काउंसलिंग के माध्यम से उन्हें सही दिशा देने का आह्वान किया।

उनके विचारों ने संगोष्ठी में उपस्थित शिक्षकों और विद्यार्थियों को शिक्षा के मानवीय पक्ष पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित किया। संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में विशेषज्ञ वक्ताओं ने छात्रों के व्यवहार निर्माण, मानसिक संतुलन, भावनात्मक मजबूती और शैक्षणिक उत्कृष्टता में काउंसलिंग की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि आज के प्रतिस्पर्धात्मक और तकनीकी दौर में विद्यार्थियों पर मानसिक दबाव लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में संस्थानों में प्रभावी काउंसलिंग प्रणाली अत्यंत आवश्यक हो गई है। संतुलित अनुशासन और संवेदनशील मार्गदर्शन छात्रों को आत्मविश्वासी, जिम्मेदार और लक्ष्य केंद्रित बनाता है। वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि शिक्षा संस्थानों को केवल परीक्षा परिणामों तक सीमित न रहकर विद्यार्थियों के भावनात्मक स्वास्थ्य, नैतिक विकास और सामाजिक जिम्मेदारी पर भी ध्यान देना चाहिए।

संगोष्ठी में यह निष्कर्ष उभरकर सामने आया कि जब अनुशासन और काउंसलिंग का संतुलित समन्वय होता है, तभी शिक्षा वास्तविक अर्थों में सफल बनती है। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित सभी डेलीगेट्स को स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया। यह सम्मान संस्थान द्वारा शिक्षा क्षेत्र में उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक रहा। इसके पश्चात अतिथियों के लिए भव्य भोज का आयोजन किया गया, जहां सभी ने सौहार्दपूर्ण वातावरण में संवाद करते हुए अपने अनुभव साझा किए। कार्यक्रम ने अकादमिक सहयोग और संस्थागत सहभागिता को भी नई दिशा प्रदान की। कार्यक्रम का समापन एचओडी-आईटी विभाग के नरेंद्र उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने सभी अतिथियों, वक्ताओं, शिक्षकों, छात्रों तथा आयोजन समिति के सदस्यों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे शैक्षणिक मंच ज्ञान के आदान-प्रदान के साथ-साथ नई सोच और नवाचार को भी प्रोत्साहित करते हैं।

इस अवसर पर कार्यकारी निदेशक डॉ. विक्रांत चौधरी, निदेशक प्रबंधन अध्ययन प्रो. (डॉ.) पंकज कुमार, एचआईएमटी कॉलेज ऑफ फार्मेसी के निदेशक प्रो. (डॉ.) अनुज मित्तल, हरलाल स्कूल ऑफ लॉ के प्राचार्य प्रो. (डॉ.) अमित सिंह, एजुकेशन विभाग की प्राचार्या डॉ. मनोरमा, बायोटेक्नोलॉजी विभाग के एचओडी डॉ. दिनेश कुमार, प्रशासनिक अधिकारी कविता चौधरी सहित संस्थान के सभी संकाय सदस्य एवं स्टाफ उपस्थित रहे। र्षिक संगोष्ठी  ‘मंथन’ ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान से नहीं, बल्कि अनुशासन, संवेदनशील मार्गदर्शन और मूल्य आधारित शिक्षा से ही संभव है। कार्यक्रम ने शिक्षा के बदलते स्वरूप में संस्थानों की भूमिका को रेखांकित करते हुए विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य की दिशा में सार्थक पहल का संदेश दिया।