हाउस टैक्स के बहाने भाजपाई चल रहे शह मात की चाल, नगर निगम बना अखाड़ा, मेयर को दरकिनार कर मंत्री सांसद और विधायकों में मची श्रेय लेने की होड़

भाजपा के दिग्गजों ने गाजियाबाद नगर निगम को राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। राजनीति रस्साकसी और एक दूसरे को पटखनी देने के लिए भाजपाई धुरंधर शह मात की चाल चल रहे हैं। हाउस टैक्स बढ़ोत्तरी के प्रस्ताव को वापस करवाने के लिए भाजपाईयों ने जिस तरह से जोर अजमाइश की वह भाजपा की अंदरूनी राजनीति को दर्शाता है। सोमवार को हुई नगर निगम की बोर्ड बैठक में सांसद अतुल गर्ग, मंत्री सुनील शर्मा, विधायक अजीत पाल त्यागी और संजीव शर्मा की मौजूदगी, हाउस टैक्स के फैसले को वापस करवाना और फिर उसका श्रेय लेने की होड़ ने यह जाहिर कर दिया है कि तीर कहीं चलाया जा रहा है लेकिन निशाने पर कोई और है। पहले भी सदन की बैठकें हुई हैं लेकिन मेयर सुनीता दयाल के कार्यकाल को छोड़ दें तो पदेन सदस्य (जनप्रतिनिधि) यदा कदा ही सिर्फ वोटिंग के लिए आवश्यकता पड़ने पर ही बोर्ड बैठक में पहुंचें हैं। थोड़ी देर बैठने या फिर वोट डालने के बाद सभी चले जाते रहे हैं। लेकिन सोमवार को बैठक में सभी जनप्रतिनिधि घंटों तक डटे रहे। जब तक हाउस टैक्स का फैसला वापस नहीं हुआ तब तक नहीं उठे। इन जनप्रतिनिधियों के समर्थन में नारेबाजी भी खूब हुई। यानी सीधी-सीधी बात कहीं जाये तो मंत्री, सांसद और विधायकों ने हाउस टैक्स के बहाने अपना शक्ति प्रदर्शन किया। इन जनप्रतिनिधियों के निशानें पर कौन था यह समझना भी कठिन नहीं है। बहरहाल यदि हाउस टैक्स बढ़ोत्तरी के प्रस्ताव को वापस लेने के फैसले की बात की जाये तो इस फैसले को शहरहित में लिया गया फैसला कतई नहीं माना जा सकता। गाजियाबाद में विकास की रफ्तार को बढ़ाना है और नगर निगम को स्वाबलंबी बनाना है तो टैक्स बढ़ोत्तरी जरूरी है।
विजय मिश्रा (उदय भूमि)
गाजियाबाद। भाजपा के दिग्गजों ने गाजियाबाद नगर निगम को राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। राजनीति रस्साकशी और एक दूसरे को पटखनी देने के लिए भाजपाई धुरंधर शह मात की चाल चल रहे हैं। हाउस टैक्स बढ़ोत्तरी के मामले में जिस तरह से भाजपा ने राजनीति की है उसने विपक्ष की कमी का एहसास नहीं होने दिया। हाउस टैक्स बढ़ोत्तरी के प्रस्ताव को वापस करवाने के लिए भाजपाईयों ने जिस तरह से जोर अजमाइश की वह भाजपा की अंदरूनी राजनीति को दर्शाता है। ऊपर से भले ही कोई बयानबाजी नहीं हो रही है लेकिन नेताओं के क्रियाकलाप से स्पष्ट रूप से जाहिर हो रहा है कि वह एक दूसरे को निपटाने की कोशिशें कर रहे हैं। भाजपाईयों की इस राजनीति में सबसे अधिक हमला मेयर सुनीता दयाल को झेलना पड़ता है। मेयर नगर निगम सदन का मुखिया होता है। प्रोटोकाल के मुताबिक भी शहर में अन्य जनप्रतिनिधियों के बीच सबसे प्रमुख स्थान मेयर का होता है।
सुनीता दयाल को मजबूत नेता माना जाता है और संघर्ष के दिनों में भाजपा के लिए सड़कों पर लड़ी है। मेयर के रूप में गाजियाबाद शहर को स्वच्छ, सुंदर और विश्वस्तरीय शहर बनाने के लिए काम कर रही है। शायद यही वजह है कि वह कई धुरंधरों को पसंद नहीं आ रही हैं और वह किसी ना किसी बहाने निशानें पर आ जाती हैं। भाजपा से जुड़े लोग ही सवाल उठा रहे हैं कि निगम बोर्ड में जब भाजपा की बहुमत है, सदन की मुखिया भाजपा से है। ऐसे में नगर निगम की एक सामान्य बोर्ड बैठक में मंत्री, सांसद और विधायक घंटों तक क्यों बैठे रहे।
30 जून सोमवार को हुई नगर निगम की बोर्ड बैठक में सांसद अतुल गर्ग, मंत्री सुनील शर्मा, विधायक अजीत पाल त्यागी और संजीव शर्मा की मौजूदगी, हाउस टैक्स के फैसले को वापस करवाना और फिर उसका श्रेय लेने की होड़ ने यह जाहिर कर दिया है कि तीर कहीं चलाया जा रहा है लेकिन निशाने पर कोई और है। पहले भी सदन की बैठकें हुई हैं लेकिन मेयर सुनीता दयाल के कार्यकाल को छोड़ दें तो पदेन सदस्य (जनप्रतिनिधि) यदा कदा ही सिर्फ वोटिंग के लिए आवश्यकता पड़ने पर ही बोर्ड बैठक में पहुंचें हैं। थोड़ी देर बैठने या फिर वोट डालने के बाद सभी चले जाते रहे हैं। लेकिन सोमवार को बैठक में सभी जनप्रतिनिधि घंटों तक डटे रहे। जब तक हाउस टैक्स का फैसला वापस नहीं हुआ तब तक नहीं उठे। इन जनप्रतिनिधियों के समर्थन में नारेबाजी भी खूब हुई। यानी सीधी-सीधी बात कहीं जाये तो मंत्री, सांसद और विधायकों ने हाउस टैक्स के बहाने अपना शक्ति प्रदर्शन किया। इन जनप्रतिनिधियों के निशानें पर कौन था यह समझना भी कठिन नहीं है। बहरहाल यदि हाउस टैक्स बढ़ोत्तरी के प्रस्ताव को वापस लेने के फैसले की बात की जाये तो इस फैसले को शहरहित में लिया गया फैसला कतई नहीं माना जा सकता। गाजियाबाद में विकास की रफ्तार को बढ़ाना है और नगर निगम को स्वाबलंबी बनाना है तो टैक्स बढ़ोत्तरी जरूरी है।
गाजियाबाद महानगर है और दिल्ली नोएडा का पड़ोसी है। गाजियाबादवासी नगर निगम से अच्छी सुविधाओं की उम्मीद करते हैं। बदले में यदि टैक्स बढ़ोत्तरी होती है तो उन्हें एतराज नहीं है। काफी लंबी प्रक्रिया, शहरवासियों के बीच सर्वे और शासन की अनुमति के बाद नियमानुसार गाजियाबाद में नई दर से टैक्स वसूली की व्यवस्था लागू की गई। नई टैक्स की दर से जितनी परेशानी करदाताओं को नहीं हुई उससे कहीं अधिक कष्ट भाजपा के दिग्गज राजनेताओं को हुई। नेताजी के समर्थक और उनके द्वारा समर्थित चुनिंदा संगठनों को छोड़ दें तो लगभग 30 लाख की आबादी वाले गाजियाबाद शहरी क्षेत्र में कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन नहीं हुआ। अधिकांश विरोध प्रदर्शन मीडिया में बयानबाजी और चंद लोगों के बीच बैठकों तक ही सिमटा रहा। लेकिन माहौल ऐसा बनाया गया कि यदि टैक्स बढ़ोत्तरी का फैसला वापस नहीं हुआ तो भाजपा की लुटिया डूब जाएगी। बोर्ड बैठक में मौजूद कई पार्षद ऐसे हैं जो टैक्स बढ़ोत्तरी का समर्थन करते रहे हैं लेकिन, दिग्गजों के प्रभाव ने उन्हें भी अपनी पुराने बातों से मुकरने को मजबूर कर दिया। हाउस टैक्स बढ़ोत्तरी के प्रस्ताव को वापस करवाकर नेताओं ने अपने अहंकार पर विजय प्राप्त कर ली है लेकिन इसे शहर की विकास में रोड़ा अटकाने वाला फैसला ही माना जाएगा।