बड़बोला पाकिस्तान : तालिबान के लिए लॉबिंग

अफगानिस्तान में सरकार का गठन करने को तालिबान बेहद उतावला है। इसके लिए वह हरसंभव हथकंडे अपना रहा है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का समर्थन पाने के लिए भी तालिबान का शीर्ष नेतृत्व दिन-रात प्रयासरत है। इस काम में रूस, चीन और पाकिस्तान जैसे मुल्क लॉबिंग करने में मशगूल हैं। यह तीनों देश आज तालिबान को दूध का धुला साबित करने में जुटे नजर आते हैं। अफगानिस्तान में अपनी पकड़ मजबूत बनाने की खातिर इन देशों में मानो होड़ सी लगी हुई है। तालिबान की सरकार को विभिन्न देशों से मान्यता दिलाने को पाकिस्तान की छटपटाहट किसी से छुपी नहीं है। ऐसे में वह जरूरत से ज्यादा बड़बोलेपन पर उतर आया है।

पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) मोईद यूसुफ का ताजा बयान चर्चाओं में है। मोईद युसूफ ने बयान दिया है कि पाकिस्तान की इच्छा है कि दुनिया के मुल्क जल्द से जल्द तालिबान की सरकार को मान्यता दें। ऐसा न होने पर भविष्य में दुनिया के सामने एक और 9/11 का खतरा है। पाक एनएसए के इस बड़बोलेपन में एक तरह से दुनिया को धमकी दिया जाना प्रतीत होता है। एक इंटरव्यू में दिए गए इस बयान के बाद मोईद युसूफ को आलोचना का शिकार होना पड़ रहा है। एक प्रकार से वह तालिबान के प्रवक्ता की तरह पेश आ रहे हैं।

दरअसल 11 सितम्बर 2001 की तिथि अमेरिका के इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो चुकी है। इस तिथि में अमेरिका पर भीषण आतंकी हमला किया गया था। इस हमले में 3 हजार से ज्यादा नागरिक मारे गए थे। 11 सितम्बर 2021 को इस हमले को पूरे 20 साल हो जाएंगे। 9/11 का हमला होने के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में कोहराम मचा दिया था। कुख्यात आतंकी ओसामा बिन लादेन की तलाश में अमेरिका की सेना ने अफगानिस्तान में भारी बमबारी की थी। इसके अलावा अफगानिस्तान की सत्ता से तालिबान को बेदखल कर दिया गया था। बाद में ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में मिला था।

पाकिस्तान के एबटाबाद क्षेत्र में अमेरिकी कमांडो ने बहादुरी का परिचय देकर लादेन का खात्मा कर दिया था। एबटाबाद में लादेन के मारे जाने से पाकिस्तान को पूरी दुनिया में शर्मसार होना पड़ा था। अमेरिका अब अफगानिस्तान में 20 साल की जंग को समाप्त कर लौट रहा है। इसके बाद अमेरिका के प्रतिद्वंदी रूस और चीन ने वहां अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी है। इसके चलते तालिबान की छवि को चमकाने और तालिबान की सरकार को अधिकाधिक देशों से मान्यता दिलाने को चीन, रूस व पाकिस्तान ऐड़ी से चोटी तक का जोर लगा रहे हैं।

अफगानिस्तान में सत्ता की दहलीज तक तालिबान को पहुंचाने में पाकिस्तान ने सबसे अह्म भूमिका निभाई है। इसके जरिए वह भारत के खिलाफ अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत मान रहा है। उसे लगता है कि भविष्य में नई दिल्ली और काबुल नजदीक नहीं आ पाएंगे। पाकिस्तान की खुशफहमी को तालिबान के कुछ नेता भी समय-समय पर बढ़ा रहे हैं। तालिबान की तरफ से हाल ही में बयान आया था कि पाकिस्तान उनका दूसरा घर है। इसके बाद पाक के सियासतदां बल्लियां उछलने लगे। उन्हें लगता कि कि अफगानिस्तान से भारत को बाहर निकालने में वह पूर्णत: सफल हो गए हैं।

हालाकि तालिबान के कुछ नेता समय-समय पर भारत के साथ बेहतर रिश्तों पर जोर दे रहे हैं। इससे इस्लामाबाद को मिर्च भी लगती है। ताकत और बंदूक के दम पर तालिबान को मिली जीत से कुछ देश भले ही आज उत्साहित दिखाई देते हैं, मगर भविष्य में पूरी दुनिया के समक्ष आतंकवाद का खतरा और ज्यादा बढऩे की संभावना से इंकार नहीं किया जा रहा है। खुफिया एजेंसियों का आशंका है कि आने वाले वक्त में अफगानिस्तान की धरती कुख्यात आतंकियों को खुलकर खेलने का मौका दे सकती है।

तालिबान और आईएसआईएस को एक-दूसरे का कट्टर प्रतिद्वंदी माना जाता है। वैसे इस दावे पर खुफिया एजेंसियों को शक है। इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि भविष्य में यह दोनों आतंकी संगठन अमेरिका के खिलाफ एकजुट नहीं होंगे। यदि ऐसा होता है तो न सिर्फ अमेरिका बल्कि उसके सहयोगी देशों की मुश्किलें बढऩा भी तय हैं। अफगानिस्तान पर कब्जा करने के लिए तालिबान ने जो रणनीति अपनाई है, उससे कई और देशों में माहौल बिगडऩे की संभावना बलबती हो सकती है। इन देशों में चरमपंथी संगठन सरकार के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक कर सत्ता पाने की कोशिश करने से पीछे नहीं हटेंगे।

दुनियाभर में आतंक को बढ़ावा देने में पाकिस्तान की भूमिका किसी से छुपी नहीं है। जब तक उस पर लगाम नहीं लगाई जाएगी तालिबान जैसे संगठन सिर उठाते रहेंगे। तालिबान के सपोर्ट में खड़े होने का खामियाजा भविष्य में चीन और रूस को भुगताना पड़ेगा। तालिबान की सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देकर विभिन्न देश एक गलत परंपरा की शुरुआत करेंगे। चूंकि तालिबान पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जो संगठन सत्ता में आने और मनमुताबिक कानून थोपने के लिए आम इंसान का खून बहा सकते हैं, उनके लिए इंसानियत कोई चीज नहीं है।

सत्ता में आने के बाद वह सुधर जाएंगे, इसकी गुंजाइश कम है। चीन और रूस जैसे ताकतवर मुल्कों ने जिस तरह तालिबान के सामने घुटने टेके हैं, उससे बेहद गलत मैसेज भी पूरी दुनिया में गया है। अफगानिस्तान मसले पर बड़े मुल्कों को आपसी वैर-भाव को पीछे रखकर कोई प्रभावी कदम उठाने के लिए आगे आना चाहिए था। जानकारों का मानना है कि अफगानिस्तान में अब हाथ जलाने का नंबर चीन का आ गया है। इसके पहले ब्रिटेन, रूस और अमेरिका वहां जाकर बड़ी गलती कर चुके हैं। तालिबान ने खुद को बदल लिया है या वह बदलने का नाटक कर रहा है, यह सच्चाई भी शीघ्र दुनिया के सामने आ जाएगी।