अफगानिस्तान में बिगड़े हालात संभाले नहीं संभल रहे हैं। हर गुजरते दिन के साथ परिस्थितियां विकट हो रही हैं। सबसे ज्यादा मुसीबत में आम नागरिक घिरे हैं। जिन्हें दिन-रात अपनी जान जाने का खतरा सता रहा है। बेशक ताकत और हथियारों के दम पर तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया है, मगर आगे का सफर इतना आसान नहीं है। देश के विभिन्न हिस्सों में विद्रोह की ज्वाला भड़क रही है। तालिबान की जुल्म और ज्यादती के खिलाफ असंतुष्ट नागरिक आवाज बुलंद कर रहे हैं। इससे गृहयुद्ध छिड़ने के आसार दिखाई देने लगे हैं।
गृहयुद्ध होने की स्थिति में तालिबान के साथ-साथ पाकिस्तान को भी बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। मौजूदा विवाद कहां तक जाएगा, यह देखना अभी बाकी है। फिलहाल मनमानी पर उतारू तालिबान को जबरदस्त चोट लगी है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अफगानिस्तान के पंजशीर क्षेत्र में विद्रोही गुट ने तालिबान के 300 लड़ाकों को ढेर कर दिया है। कुछ लड़ाकों को बंदी बना लिया गया है। इस घटना ने आतंकी संगठन के हुक्मरानों की चिंता को निश्चित तौर पर बढ़ाया है।
पंजशीर घाटी में पहले भी तालिबान को मुंह की खानी पड़ी थी। अब से 20 साल पहले पंजशीर के लड़ाकों ने एकजुट होकर बहादुरी के साथ संघर्ष किया था। नतीजन यह घाटी गुलाम नहीं बन पाई थी। अफगानिस्तान के घटनाक्रम में फिलहाल समूची दुनिया की नजरें टिकी हैं। वहां पल-पल हालात बदल रहे हैं। खुफिया एजेंसियों की सटीक जानकारी और अनुमानों को ध्वस्त कर तालिबान ने जिस तेजी से काबुल पर कब्जा कर लिया था, उससे दुनिया हैरान-परेशान हो गई थी। तालिबान लड़ाकों ने 15 अगस्त को अचानक काबुल पर फतह की घोषणा कर दी थी। इसके बाद से शहरभर में अफरा-तफरी और उथल-पुथल मच गई थी। यह स्थिति अब तक जारी है।
काबुल एयरपोर्ट के भीतर और बाहर बड़ी संख्या में नागरिक जुटे हैं। हर कोई जल्द से जल्द देश छोड़ने को आतुर है। चूंकि नागरिकों को मालूम है कि तालिबान के राज में जिंदगी नर्क से भी बदतर होनी तय है। काबुल एयरपोर्ट की आंतरिक सुरक्षा एवं व्यवस्था अमेरिका और ब्रिटेन के सैनिकों ने संभाल रखी है। जबकि एयरपोर्ट के बाहर तालिबान लड़ाकों का साम्राज्य कायम हो चुका है। अफगानिस्तान में सरकार का गठन करने को तालिबान के नेता दिन-रात मंथन कर रहे हैं। हालाकि तालिबान के लिए आगे का सफर कांटों भरा होगा।
आतंकी संगठन के विरोध में तेजी से माहौल बन रहा है। कुछ दिन पहले जलालाबाद में सैकड़ों नागरिकों ने सड़कों पर उतर कर न्याय के लिए आवाज बुलंद की थी। नागरिकों ने जलालाबाद के मशहूर चौक से तालिबान का सफेद ध्वज हटाकर अफगानिस्तान का राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया था। अब पंजशीर घाटी में विद्रोही गुट ने सख्त तेवर दिखाए हैं। अफगानिस्तान के 34 में से 33 प्रांत पर तालिबान का कब्जा हो चुका है। सिर्फ पंजशीर घाटी इकलौता ऐसा प्रांत है, जहां अब तक इस आतंकी संगठन की दाल नहीं गल पाई है।
दरअसल देश के अलग-अलग हिस्सों से अफगान सैनिक जान बचाकर इस घाटी में जुट गए हैं। जहां इन सैनिकों ने तालिबान के खिलाफ हाथ मिला लिए हैं। पंजशीर घाटी को कब्जाने की नीयत से तालिबान ने 300 से ज्यादा लड़ाकों को वहां भेजा था, मगर विद्रोही गुट ने मुंहतोड़ जबाव देकर अपने इरादों को साफ कर दिया। 300 लड़ाकों के मारे जाने से तालिबान बौखला गया है। वह अब 3 हजार लड़ाकों को वहां भेजने की योजना बना रहा है। खुफिया एजेंसियों का मानना है कि पंजशीर घाटी में तालिबान को जबाव देने के लिए 9 हजार से ज्यादा लड़ाके मौजूद होने की संभावना है।
तालिबान के खौफ से राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पिछले दिनों एकाएक अफगानिस्तान छोड़ दिया था। वर्तमान में वह संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की शरण में हैं। गनी के देश छोड़कर भागने के बाद उप-राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने खुद को कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित कर दिया था। मूल रूप से पंजशीर घाटी के रहने वाले सालेह ने तालिबान के खिलाफ जंग जारी रखने का ऐलान भी कर दिया था। माना जाता है कि अमरुल्लाह सालेह इन दिनों पंजशीर घाटी में रह रहे हैं। वह पहले भी तालिबान के लिए सिरदर्द बने रहे हैं।
यदि पंजशीर घाटी को विदेशी सैन्य सहायता मिल जाती है तो वहां की स्वतंत्रता पर आंच तक आना मुमकिन नहीं है। हालाकि मौजूदा हालात में वहां विदेशी सैन्य मदद का पहुंचना संभव नहीं है। पंजशीर घाटी से तालिबान को चुनौती मिलने की असल वजह यह है कि वहां के नागरिक अपनी जमीन से अपनी जान से ज्यादा प्यार करते हैं। वह जान देने को तैयार हैं, मगर जमीन छोड़ने को राजी नहीं हैं। पंजशीर में मात मिलने के बावजूद तालिबान की हेकड़ी कम नहीं हो सकी है। इस आतंकी संगठन ने सीधे अमेरिका को धमकी दे डाली है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने 31 अगस्त तक अपने सैनिकों को काबुल से बाहर निकालने का ऐलान किया था। मौजूदा हालात में यूएस की रणनीति बदल सकती है। इसके मद्देनजर तालिबान बेचैन है।
तालिबान ने चेतावनी भरे बयान में कहा है कि यदि निर्धारित समयावधि में अमेरिकी सैनिकों ने अफगानिस्तान नहीं छोड़ा तो इसके खतरनाक अंजाम उन्हें भुगतने पड़ेंगे। राष्ट्रपति बाइडेन को अमेरिका के अलावा दुनियाभर में आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। अफगान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी में जिस प्रकार की रणनीति अपनाई गई, उसने बाइडेन की साख को नुकसान पहुंचाया है। डैमेज कंट्रोल की कोशिश के क्रम में वह अपने निर्णय को बार-बार सही ठहराने में लगे हैं, मगर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी इस मुद्दे पर बाइडेन को घेरने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रही है।
















