गाजियाबाद। जीडीए की तुलसी निकेतन कॉलोनी में जर्जर भवनों में रहने वाले करीब 10 हजार लोगों को एक बार फिर जान का डर सताने लगा है। बारिश के मौसम में यह तुलसी निकेतन के जर्जर भवनों में रह रहे हैं। खास बात यह है कि जीडीए इन जर्जर भवनों में रहने वाले लोगों को पहले ही नोटिस दे चुका हैं। मगर यह लोग मकानों को खाली नहीं कर रहे हैं। जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट आने के बाद इन्हें पांच साल पहले असुरक्षित घोषित किया जा चुका है। ऐसे में बारिश का मौसम आते ही इनके गिरने का खतरा बना रहता है। जीडीए और वहां रहने वाले लोगों के बीच सहमति नहीं बनने से लोग अपनी जान को जोखिम में डालकर यहां रह रहे हैं। जीडीए के प्रभारी चीफ इंजीनियर मानवेंद्र कुमार सिंह का कहना है कि दिल्ली जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट के आधार पर इन मकानों को जर्जर घोषित किया जा चुका है। नगर निगम ने हालांकि अपनी रिपोर्ट नहीं दी है।
जीडीए की ओर से वहां रहने वाले लोगों को पहले ही नोटिस दिए जा चुके हैं। मगर वहां रहने वाले लोग इन मकानों को खाली नहीं कर रहे है। दरअसल, जीडीए ने वर्ष-1990 में 8 हेक्टेयर जमीन में 2004 ईडब्ल्यूएस व 288 एलआईजी फ्लैट का निर्माण कराकर तुलसी निकेतन कॉलोनी बसाई थी। 34 साल पहले बनी इस कॉलोनी में 2292 फ्लैट है। इनमें 10 हजार से अधिक लोग रहते हैं। फ्लैट के आवंटन के बाद बिल्डिंग की मरम्मत नहीं होने से 30 साल में ही बिल्डिंग जर्जर हो गई। जीडीए ने पांच साल पहले यहां सर्वे कराया था। जिसमें यह जर्जर भवन रहने योग्य नहीं पाए गए थे। जीडीए ने इन फ्लैट को असुरक्षित घोषित करा नए भवन बनाने की पेशकश की थी।
यहां पर 9 बहुमंजिला बिल्डिंग बनाकर फ्लैट आवंटन किए गए थे। बाकी की जमीन को बेचकर जीडीए ने पुनर्निर्माण का खर्चा निकालने का फैसला किया था। मगर इस प्रस्ताव को वहां के लोगों ने अस्वीकार कर दिया दिया था,जीडीए ने सिर्फ उन्हीं लोगों को नि:शुल्क आवास देने की बात कही थी, जिनके पास फ्लैट की रजिस्ट्री है। यहां रहने वाले 90 फीसदी लोग फ्लैट के मूल आवंटी नहीं हैं। इन्होंने मूल आवंटी से पावर ऑफ अटॉर्नी कराकर फ्लैट में रहना शुरू कर दिया था। जीडीए ने शासन को भी इस बारे में पत्र लिखा था। लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं हुआ। बेघर होने के डर से लोग अपनी जान जोखिम में डाले हुए हैं।
















