-केदारसभा के अध्यक्ष पं राजकुमार तिवारी ने किया अभिनंदन
रुद्रप्रयाग। रविदास अखाड़ा के राष्ट्रीय प्रवक्ता नरेंद्र चौधरी ने मंगलवार को अपने सहयोगी समित रंजन चाकी और संजीव भाटिया के साथ बाबा केदारनाथ के दर्शन किए और विधिवत पूजा अर्चना की। इस दौरान केदारसभा के अध्यक्ष पं राजकुमार तिवारी, मंदिर के मुख्य पुजारी शिव शंकर लिंग महाराज, केदार सभा के महामंत्री पं अंकित सेमवाल, आचार्य संजय तिवारी, मीडिया प्रभारी पं पंकज शुक्ला, मंदिर समिति के प्रबंधक अरविंद शुक्ला, मंदिर के कर्मचारी ललित त्रिवेदी, पारेश्वर त्रिवेदी, संजय तिवारी, रोशन त्रिवेदी ने उनका अभिनंदन किया। एक दिवसीय यात्रा पर बाबा केदारनाथ धाम पहुंचे श्री चौधरी ने बताया कि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए जिस तरह से व्यवस्था की गई है वह बहुत ही अतुल्यनीय है। रविदास अखाड़ा के राष्ट्रीय प्रवक्ता नरेंद्र चौधरी ने बताया उत्तराखंड राज्य में हिमालय पर्वत की गोद में केदारनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंग में सम्मिलित होने के साथ ही चार धाम और पंच केदार में से भी एक है।
इस ज्योतिर्लिंग की यात्रा करना हर शिव भक्त के लिए किसी सपने से कम नहीं है। उत्तरी हिमालय की तलहटी में बसे इस क्षेत्र में हांलाकि लोग धार्मिक आस्था के कारण आते हैं, लेकिन हिमालय की बर्फीली चोटियों का नैसर्गिक सौंदर्य और मंदाकिनी नदी की कलकल ध्वनि यात्रियों का मन मोह लेती है। उन्होंने कहा धार्मिक दृष्टि से देखें तो केदारनाथ की बड़ी महिमा है। उत्तराखंड में बद्रीनाथ और केदारनाथ- ये दो प्रधान तीर्थ हैं। दोनो के दर्शनों का बड़ा ही महत्व है। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किए बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है, उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है। इनके दर्शन-पूजन करने पर सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती हैं एवं मनुष्य की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। सनातन धर्म की आस्था के अनुसार केदारनाथ धाम को ऊर्जा का बड़ा केंद्र माना जाता है।
बाबा के घाव को आराम देने के लिए किया जाता है घी और मक्खन का लेप
केदारनाथ भगवान का घी और मक्खन से लेप किया जाता है, ताकि उनके घाव को आराम मिले. कहते हैं भगवान केदारनाथ पांडवों को भगवान दर्शन नहीं देना चाहते थे और जब पांडवों ने उनके जबरदस्ती दर्शन करने चाहे तो भगवान की पीठ मे घाव हो गए. यही वजह है कि आज भी केदारनाथ में भगवान का घी और मक्खन से पूजन किया जाता है, लेकिन केदारनाथ के दर्शन का सीधा योग बदरीनाथ से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि बद्रीनाथ के दर्शन का पुण्य तब तक नहीं मिलता, जब तक भक्त केदारनाथ के दर्शन नहीं कर लेते। केदारनाथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन से सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं। भगवान केदारनाथ साढ़े ग्यारह हजार फीट की ऊंचाई पर विराजते हैं। कहते हैं पांडवों से छिपने के लिए बाबा यहां आए थे, और यहीं पांडवों को कुलहत्या के पाप से मुक्ति मिली थी।
केदारनाथ, शिव भक्तों की वो मंजिल है जिसके बिना जीवन नहीं संवरता, जिनके दर्शन के लिए भक्तों का मन तरसता है, जिनका आशीर्वाद पाने की राह में न तो हिमालय की दुर्गम चोटियां रोड़ा बन पाती हैं और न ही पथरीले रास्ते मुश्किलें पैदा कर पाते हैं। पंचकेदारों में प्रमुख केदारनाथ मंदिर में भगवान शिव के धड़ रुप के दर्शन होते हैं। द्वापर युग में पांडवों से बचने के लिए जब महादेव ने भैंसे का रूप धारण किया तो उनका धड़ यहीं गिरा था। यह कहानी द्वापर युग से जुड़ी है, यह कहानी पांडवों से जुड़ी है। महाभारत युद्ध जीतने के बाद पांडवों कुलहत्या का पाप धोना चाहते थे और इसके लिए वो भगवान शिव के दर्शन करना चाहते थे, लेकिन औघड़दानी तो पांडवों से नाराज थे और इसलिए वो दर्शन देकर उन्हें पाप मुक्त नहीं करना चाहते थे। तब शिव भैंसा रूप धारण कर केदार में छिप गए थे।


















