Afghanistan आखिरकार क्रूर तालिबान के चंगुल में आ गया है। मौजूदा हालात की आशंका काफी पहले से महसूस हो रही थी। तस्वीर अब बिल्कुल साफ हो गई है। तालिबान के आक्रामक तेवरों से आज समूची दुनिया चिंतित है। Afghanistan के विभिन्न हिस्सों में खराब हालात की डरावनी वीडियो और फोटो ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा रखा है। चारों तरफ अफगानी नागरिकों की दुखद दास्तां का जिक्र हो रहा है। काबुल में एकाएक बदले घटनाक्रम ने अमेरिका की खुफिया एजेंसियों के पूर्वानुमानों को ध्वस्त कर दिया है। इन एजेंसियों ने बाइडेन प्रशासन को सौंपी रिपोर्ट में आशंका जाहिर की थी कि अगले 30 से 90 दिनों के भीतर काबुल पर तालिबान का कब्जा हो सकता है, मगर जिस तेजी और हैरतअंग्रेज तरीके से घटनाक्रम बदला है, वह भविष्य के लिए अच्छे संकेत कतई नहीं हैं।
Afghanistan की राजधानी काबुल में हर तरफ अफरा-तफरी और दहशत का आलम है। अपनी जान बचाने के लिए नागरिक बदहवास हालत में भाग रहे हैं। अमेरिका की चेतावनी के बावजूद तालिबानी लड़ाकों ने काबुल पर कब्जा करने में देरी नहीं की। राष्ट्रपति भवन तक पर तालिबान का अधिपत्य कायम हो चुका है। इसके बाद राष्ट्रपति अशरफ गनी को जान बचाकर भागना पड़ा है। राष्ट्रपति गनी का यकायक देश छोडक़र भाग जाना अफगान की जनता को रास नहीं आ रहा है। भंवर में फंसे नागरिकों को उनके हाल पर छोडक़र अशरफ गनी का इस तरह काबुल को छोड़ देना घोर निंदनीय है। चर्चा है कि वह अब अमेरिका में शरण लेने की तैयारी में हैं। काबुल से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता अब एयरपोर्ट बचा है।
काबुल एयरपोर्ट पर सैकड़ों की तादात में यात्री जमा हैं। सभी जल्द से जल्द हवाई मार्ग से सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचने को बेचैन हैं। काबुल एयरपोर्ट के भीतर की वीडियो और फोटो ने भी इंसानियत को शर्मसार कर दिया है। वहां प्लेन में सवार होने की जद्दोजहद दर्शाती है कि नागरिकों के मन में तालिबान का खौफ किस कदर तक बैठा है। काबुल एयरपोर्ट से उड़े अमेरिकी सैन्य विमान के पहियों में 3 अफगानी नागरिक छुपकर बैठ गए थे ताकि वह काबुल से जान बचाने में सफल हो सकें, मगर किस्मत को कुछ और मंजूर था। विमान के उड़ान भरने पर तीनों अफगानी आसमान से नीचे आ गिरे। इस दर्दनाक हादसे में तीनों की जान चली गई। यह हैरतअंगेज घटना भीतर तक झकझोर देती है। सत्ता हाथ में आने के बाद तालिबान की मनमानी पहले की तरह बढऩा तय हैं।
Afghanistan में फिलहाल अनिश्चितता का माहौल है। अफगानी नागरिक आज अमेरिका को भी कोस रहे हैं। अमेरिका ने साढ़े 3 करोड़ से ज्यादा नागरिकों को तालिबान के आगे बेबस होने को छोड़ दिया है। पिछले 20 साल में अफगानिस्तान की तस्वीर में व्यापक बदलाव देखने को मिला था। बेशक तालिबान समय-समय पर हिंसा पर उतारू रहा, मगर वहां विकास, एजुकेशन, स्पोट्र्स, सुरक्षा इत्यादि क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन आया था। खासकर महिलाओं को पढऩे और नौकरी करने की आजादी मिल गई थी। शिक्षा और कारोबार के क्षेत्र में महिलाएं निरंतर आगे बढ़ रही थीं। तालिबान राज में सबसे ज्यादा परेशानी और पाबंदी महिलाओं को झेलनी पड़ेंगी। रूढि़वादी कानूनों के नाम पर उन्हें घरों में कैद रहने को मजबूर कर दिया जाएगा। बेहतर तरीके से जीवन जीने के लिए वह खुलकर उड़ान नहीं भर पाएंगी। तालिबान के लड़ाके पिछले कुछ समय में विभिन्न शिक्षण संस्थानों को ध्वस्त कर चुके हैं।
अमेरिका की नीतियों से नाराज कुछ अफगान नागरिकों ने व्हाइट हाउस के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से अफगान जनता के लिए इंसाफ की आवाजें पुरजोर तरीके से उठ रही हैं। सोशल मीडिया पर अमेरिका और तालिबान की खूब लानत-मलानत की जा रही है। संकट के घिरे अफगानिस्तान पर अमेरिका के इतर कुछ मुल्कों ने अपने हित को साधने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। यदि अमेरिका, रूस, चीन, पाकिस्तान और भारत जैसे मुल्क एकजुट होकर जबरदस्त तरीके से तालिबान का विरोध करते तो Afghanistan के हालात आज कुछ और होते, मगर सभी मुल्कों ने अपने हित को साधना बेहतर समझा है।
रूस ने तालिबान के नेताओं से वार्ता कर अपनी सहयोगी मुल्कों की सीमाएं सुरक्षित कर ली हैं। जबकि चीन और पाकिस्तान ने भी तालिबान से अच्छे संबंध बना लिए हैं। चीन की नजर Afghanistan में उपलब्ध खनिज के अथाह भंडार पर है। वहां लगभग 5 ट्रिलियन डॉलर का खनिज भंडार होने का अनुमान है। इसके जरिए चीन अपनी अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने की मंशा पाले है। काबुल से भारत को दूर कर पाकिस्तान अपने मकसद में कामयाब हो गया है। सत्ता पर तालिबान की ताजपोशी होने पर पाकिस्तान के दोनों हाथ में लड्डू आ जाएंगे। चूंकि तालिबान पर पाकिस्तान की पकड़ सबसे मजबूत है। भविष्य में वह तालिबान का प्रयोग भारत के खिलाफ करने से भी नहीं चूकेगा। इससे भारत की सुरक्षा व्यवस्था को बड़ा खतरा उत्पन्न होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा रहा है। वर्तमान स्थिति यह बताने को काफी है कि Afghanistan में भारत का रोल लगभग समाप्त हो गया है।
तालिबान की तरफ से भारत को लेकर पिछले कुछ समय में मिले-जुले बयान सुनने को मिले हैं। एक तरफ तालिबान के नेता भारत के साथ किसी प्रकार का द्वेषभाव न रखने की बात करते हैं, दूसरी ओर वह खुली धमकी देने से भी बाज नहीं आते हैं। तालिबान को साधने में भारत विफल रहा है। भविष्य में तालिबान भारत के लिए सिरदर्द न बने, इसके लिए कुटनीतिक प्रयास तेज करने की जरूरत है। रूस और चीन की तरह भारत को भी तालिबान के शीर्ष नेतृत्व से विभिन्न बिंदुओं पर खुलकर बात करनी चाहिए। बातचीत के परिणाम सकारात्मक आते हैं तो ठीक वरना भविष्य की रणनीति बनाने में देरी नहीं करनी चाहिए। यह समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
















