अफगानिस्तान : अमेरिका की सुपर फ्लॉप रणनीति

अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी की रणनीति सुपर फ्लॉप निकली है। बेहद जल्दबाजी और हड़बड़ी में उठाए गए कदम बेहद घातक साबित हो रहे हैं। इसके चलते अमेरिका को आज दुनियाभर में शर्मसार होना पड़ा है। जांबाज और बहादुर सेना की साख को नुकसान पहुंचा है। तालिबान की मनमानी और आक्रामकता निरंतर बढ़ रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन को घर और बाहर सभी जगह आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। आलोचकों की उन्हें कोई परवाह नहीं है। अपने निर्णय को वह सही मान रहे हैं।

इसके इतर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को आप बेशक बड़बोला या मसखरा कहें, मगर आज ट्रंप के कार्यकाल को जरूर याद किया जा रहा है। अमेरिका के भीतर और बाहर भी समर्थक उन्हें खूब सराह रहे हैं। दूसरी बार राष्ट्रपति बनने का ट्रंप का सपना पूरा नहीं हो पाया, मगर वह भविष्य को लेकर काफी आशावान हैं। काबुल संकट के बाद अमेरिका में कराए गए सर्वे में यह बात सामने आई है कि यदि वर्तमान में चुनाव कराए जाते हैं तो राष्ट्रपति पद पर ट्रंप की वापसी मुमकिन है। राष्ट्रपति पद पर रहते समय ट्रंप के विभिन्न रूप देखने को मिले थे।

माहौल को देखकर वह हंसी-मजाक भी खूब करते थे। विरोधियों को जबाव देने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ते थे। जबकि अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन का स्वभाव बेहद शांत नजर आता है। ठोस फैसले लेने से वह हिचकिचाते हैं। राष्ट्रपति बनने के बाद बाइडेन ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के लिए 11 सितम्बर 2021 की डेडलाइन निर्धारित की थी। बाद में दबाव में आकर उन्होंने यह समय सीमा घटाकर 31 अगस्त तय कर दी। दरअसल अफगानिस्तान में पिछले 20 साल से अमेरिका जंग लड़ रहा था।

आम अमेरिकी भी अब विदेशी धरती पर जंग के पक्ष में नहीं हैं, मगर अफगानिस्तान को छोडऩे के लिए अपनाई गई रणनीति फेल होने से अमरिकी नागरिक भी गुस्से में हैं। तालिबान ने जिस तेजी से काबुल पर कब्जा किया, वह हैरत में डालता है। काबुल एयरपोर्ट पर अभी भी बड़ी संख्या में नागरिक एकत्र हैं। इस बीच तालिबान की आक्रामकता बढ़ना और अमेरिका का अनुनय-विनय करना किसी को अच्छा नहीं लगा है। अफगानिस्तान में कई अरब डॉलर के अत्याधुनिक हथियार तक अमेरिका वापस नहीं ले जा सका है। इनमें हवाई जहाज तक शामिल हैं।

यह सैन्य साजो-सामान अब तालिबान के हाथ लग चुका है। इससे भी अमेरिकी नागरिकों में नाराजगी है। तालिबान के सामने राष्ट्रपति जो बाइडेन का इस तरह लचीला रूख अपनाना समझ से परे है। काबुल एयरपोर्ट के बाहर आत्मघाती हमलों में 13 अमेरिकी सैनिकों की जान तक जा चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अफगानिस्तान मसले पर पाकिस्तान पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना अमेरिका को भारी पड़ा है। पाकिस्तान आज तालिबान का सबसे खासम-खास बन गया है। वह रूस और चीन की गोद में बैठा दिखाई देता है।

अफगानिस्तान में रूस, चीन और पाकिस्तान की तिकड़ी निकट भविष्य में भारत के लिए भी मुसीबत पैदा कर सकती है। जानकारों का मानना है कि यदि डोनाल्ड ट्रंप आज अमेरिका के राष्ट्रपति होते तो निश्चित तौर पर अफगानिस्तान की हालत कुछ और होती। चूंकि ट्रंप सख्त फैसले लेकर तालिबान को घुटनों पर ला देते। हाल-फिलहाल में ट्रंप ने एक इंटरव्यू के दौरान तालिबान नेता मुल्ला बारादर के साथ अपनी मुलाकात के राज खोले हैं। एक सवाल के जबाव में उन्होंने कहा कि बातचीत के दौरान उन्होंने तालिबान के नेता को साफ शब्दों में चेता दिया था कि यदि अफगानिस्तान में अमेरिका के हितों पर आंच आई तो अंजाम बेहद बुरे होंगे।

ट्रंप ने इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने तालिबान नेता को कम शब्दों में बेहतर तरीके से समझा दिया था। इसके पहले ट्रंप यह कह चुके हैं कि अगर वह वर्तमान में राष्ट्रपति होते तो अमेरिका को शर्मसार नहीं होना पड़ता। अफगानिस्तान से शत-प्रतिशत सैनिकों को बाहर निकालने की अमेरिकी डेडलाइन नजदीक आ चुकी है। इसके चलते युद्धस्तर पर काम चल रहा है। काबुल में सरकार गठन के लिए तालिबान के नेता दिन-रात प्रयास कर रहे हैं। भविष्य में वहां के हालात किस प्रकार बदलेंगे, इसे लेकर अभी सिर्फ कयास लगाए जा रहे हैं।

अफगानिस्तान में पूरी तरह से तालिबान का राज आने पर विभिन्न आतंकी संगठनों को बढ़ावा मिलना तय है। इसका खामियाजा अमेरिका को भी भुगतना पड़ सकता है। अमेरिका पर 2001 में आतंकियों ने जबरदस्त हमला किया था। इस आतंकी हमले को अब 2 दशक पूरे होने जा रहे हैं। इस बीच तालिबान ने यह बयान दिया है कि अमेरिका पर हमले में ओसामा बिन लादेन का हाथ नहीं था। तालिबान का यह बयान भी आश्चर्यचकित करने वाला है। अमेरिका पर भरोसा किया जाए अथवा नहीं, उसके सहयोगी भी इस मुद्दे पर अब आत्ममंथन करने में लग गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की लोकप्रियता में जबरदस्त गिरावट आई है। इसका असर वहां की राजनीति पर पड़ना तय है।

अमेरिका में सत्ता पक्ष को इस समय विपक्ष के तीखे हमलों का सामना करना पड़ रहा है। खासकर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुलकर बयानबाजी कर सत्ता पक्ष को परेशान कर रहे हैं। ट्रंप को लगता है कि बाइडेन की पार्टी पर बढ़त बनाने का यह अच्छा मौका है। उधर, भारत ने अब तक अफगानिस्तान को लेकर अपनी रणनीति का खुलासा नहीं किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को देर-सवेरे तालिबान से वार्ता करनी पड़ सकती है। चूंकि अफगानिस्तान में भारत का 3 अरब डॉलर का निवेश दांव पर लगा है। माना जाता है कि अच्छा वक्त देखकर नई दिल्ली की तरफ से इस बारे में आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।