-हनुमान ध्वजा हेतु नाग जगई से पारंपरिक वैदिक विधि से काटा गया बांस, तीर्थ पुरोहितों व स्थानीय श्रद्धालुओं ने की पुण्य यात्रा की शुरुआत
उदय भूमि संवाददाता
रुद्रप्रयाग। वर्ष 2013 की भीषण आपदा, जिसने केदारघाटी सहित समूचे उत्तराखंड को झकझोर दिया था, उसकी स्मृति आज भी जनमानस को व्यथित करती है। उन्हीं दिवंगत पुण्य आत्माओं की शांति एवं लोक कल्याण की भावना से ओतप्रोत होकर आगामी 25 जुलाई से श्री केदारनाथ धाम में सप्त दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। इस पावन आयोजन की विधिवत शुरुआत आज वैदिक रीति-रिवाजों और पारंपरिक श्रद्धा के साथ की गई। हनुमान जी की ध्वजा स्थापना के लिए नाग जगई स्थित देवी मंदिर के समीप से विशेष बांस को वैदिक पूजन के उपरांत काटा गया, जो केदारनाथ धाम ले जाया जाएगा। यह ध्वजा श्रीमद्भागवत कथा यज्ञ में शुभ संकेत और शक्ति का प्रतीक मानी जाएगी। शनिवार सुबह ठीक 8 बजे, पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे बिप्रजन और तीर्थ पुरोहित समाज के सदस्य पौंला स्थित श्री भैरवनाथ मंदिर के प्रांगण में एकत्र हुए।
वहाँ से वे उत्तराखंड की संस्कृति के प्रतीक बाद्य यंत्रों ढोल और दमाऊ की मधुर ध्वनि के साथ जगई क्षेत्र की ओर प्रस्थान कर गए। देवी मंदिर परिसर में विधिवत मंत्रोच्चार और वैदिक परंपरा के अनुरूप पूजा-अर्चना के बाद भगवान श्री हनुमान जी की ध्वजा हेतु विशिष्ट बांस का चयन कर उसका पूजन किया गया। यह बांस केदारनाथ धाम पहुंचाकर ध्वजारोहण के लिए प्रयुक्त होगा, जिससे यज्ञ की पवित्रता और आध्यात्मिक ऊर्जा और भी सशक्त हो सके। इस पुण्य आयोजन में श्री केदार सभा के अध्यक्ष पं. राजकुमार तिवारी, उपाध्यक्ष श्री विष्णु कान्त कुर्मांचली, पूर्व जिला पंचायत उपाध्यक्ष सुमंत तिवारी, कोषाध्यक्ष पं. प्रवीण तिवारी, वरिष्ठ तीर्थ पुरोहित पं. केशव तिवारी, पूर्व उपाध्यक्ष आनंद सेमवाल, रूपनारायण शुक्ला, प्रदीप तिनसोला, मीडिया प्रभारी पं. पंकज शुक्ला, आचार्य संतोष त्रिवेदी, व्यापार संघ अध्यक्ष चंडी प्रसाद तिवारी, श्रीमती गायत्री देवी, अजय जुगरान, प्रवक्ता पंकज जी सहित अनेक सम्माननीय हस्तियों की उपस्थिति रही।
विशेष उल्लेखनीय है कि श्री चंडी प्रसाद तिवारी ने स्वयं हनुमान ध्वजा हेतु बांस प्रदान कर अपनी श्रद्धा और आस्था का अनुपम परिचय दिया। इस श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ में भगवान श्रीहरि की लीलाओं, भक्ति, कर्म, धर्म और मोक्ष का समन्वय होगा। श्रद्धालुओं को केवल धर्मिक लाभ ही नहीं, अपितु आत्मिक शांति और लोक कल्याण का संदेश भी प्राप्त होगा। यह आयोजन केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि एक पीढ़ी को आपदा की पीड़ा से जोड़कर आध्यात्मिक दिशा में आगे ले जाने का प्रयास है।

















