जिस तरह इन दिनों लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनों के निशाने पर हैं, उसी तरह गाजियाबाद में मेयर सुनीता दयाल पर भी अपने ही निशाना साध रहे हैं। प्रदेश में जिस तरह योगी जनता के बीच लोकप्रिय हैं, गाजियाबाद में उसी तरह सुनीता दयाल शहरवासियों के बीच लोकप्रिय हैं। जिस तरह भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधायक योगी को मुख्यमंत्री पद से हटवाने को आतुर हैं, उसी तरह गाजियाबाद के माननीय सांसद और विधायकों की लॉबी सुनीता दयाल को कमजोर कर नगर निगम में अपना सिक्का चलाना चाहते हैं। योगी के खिलाफ केशव प्रसाद मौर्य को हथियार बनाया गया है, ठीक उसी अंदाज में सुनीता दयाल के खिलाफ पार्षदों को इस्तेमाल किया जा रहा है। मेयर का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। ऐसे में सुनीता दयाल को पद से हटाना तो संभव नहीं है लेकिन उन्हें उलझाकर, छवि कमजोर कर और जनमानस में लोकप्रियता का ग्राफ घटाकर मेयर को कमजोर करने की पुरजोर कोशिशें हो रही है।
विजय मिश्रा (उदय भूमि)
गाजियाबाद। कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना की तर्ज पर गाजियाबाद में भाजपाईयों की राजनीति चल रही है। गाजियाबाद में विपक्ष नहीं बल्कि सत्ताधारी दल भाजपा के लोग ही एक दूसरे को निपटाने में जुटे हैं। जिस तरह इन दिनों लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनों के निशाने पर हैं, उसी तरह गाजियाबाद में मेयर सुनीता दयाल पर भी अपने ही निशाना साध रहे हैं। प्रदेश में जिस तरह योगी जनता के बीच लोकप्रिय हैं, गाजियाबाद में उसी तरह सुनीता दयाल शहरवासियों के बीच लोकप्रिय हैं। जिस तरह भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधायक योगी को मुख्यमंत्री पद से हटवाने को आतुर हैं, उसी तरह गाजियाबाद के माननीय सांसद और विधायकों की लॉबी सुनीता दयाल को कमजोर कर नगर निगम में अपना सिक्का चलाना चाहते हैं। योगी के खिलाफ केशव प्रसाद मौर्य को हथियार बनाया गया है, ठीक उसी अंदाज में सुनीता दयाल के खिलाफ पार्षदों को इस्तेमाल किया जा रहा है। मेयर का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। ऐसे में सुनीता दयाल को पद से हटाना तो संभव नहीं है लेकिन उन्हें उलझाकर, छवि कमजोर कर और जनमानस में लोकप्रियता का ग्राफ घटाकर मेयर को कमजोर करने की पुरजोर कोशिशें हो रही है। शुक्रवार को नगर निगम की बैठक में जो कुछ हुआ वह इसी बात की ताकीद कर रहा है। नगर निगम बोर्ड बैठक की घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि नगर निगम पर कब्जे को लेकर गाजियाबाद के दिग्गजों के बीच चल रही नूरा-कुश्ती आगे भी जारी रहेगी।
माना जाता है कि बीजेपी एक अनुशासित पार्टी है, आपसी तालमेल के साथ पार्टी में फैसले लिए जाते हैं। लेकिन नगर निगम कार्यकारिणी के चुनाव के दौरान स्थिति ठीक इसके उलट दिखाई दिया। छह सदस्यों के लिए निगम सदन बैठक में चुनाव की प्रक्रिया के दौरान जहां बीजेपी के द्वारा पार्टी की तरफ से चार प्रत्याशियों की सूची जारी की थी और माना जा रहा था कि दो गैर भाजपायी पार्षदों को सदस्य बनने का मौका मिलेगा। लेकिन भाजपा के तीन पार्षदों सहित एक भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी ने भी नामांकन दाखिल कर दिया। मेयर सुनीता दयाल के साथ भाजपा महिला पार्षद नीलम भारद्वाज और संजय सिंह की तकरार हुई। संजय सिंह का तर्क था कि कोटा सिस्टम समाप्त होना चाहिए, वहीं नीलम भारद्वाज ने मेयर पर धमकाने का ही आरोप लगा दिया। भाजपा की तरफ से नरेश भाटी, अमित मुदगल, पूनम सिंह एवं नीरज गोयल अधिकृत प्रत्याशी थे। जबकि इन पार्षदों के अलावा राजीव शर्मा, नीलम भारद्वाज, संजय सिंह और योगेंद्र सिंह ने भी नामांकन कर दिया। विपक्ष की तरफ से आम आदमी पार्टी से पार्षद चौधरी मुस्तकीम एवं बसपा पार्षद नरेश जाटव ने नामांकन किया था। प्रोटोकॉल को दरकिनार कर भाजपा पार्षदों की खुली बगावत ने संगठन की कार्यशैली की भी कलई खोल दी है। मामला सुलझाने के लिए भाजपा महानगर अध्यक्ष संजीव शर्मा ने भी कथित रूप से भरपूर कोशिशें की। लेकिन कोई हल निकला। नगर निगम की घटना से पार्षद संजय सिंह के इन आरोपों को भी बल मिल रहा है कि गाजियाबाद में भाजपा के दिग्गज नेता कोटा सिस्टम चला रहे हैं। अपनी इच्छा के अनुसार अपने चहेते को मलाईदार जगहों पर स्थापित कर नगर निगम में अपना दबदबा बढ़ाकर मेयर सुनीता दयाल को घेरने में जुटे हैं। अब देखना होता है कि लखनऊ की ही तरह गाजियाबाद में भी अंतिम स्थिति क्या बनती है। यूं ही अपनों के बीच रस्सा-कस्सी चलती रहेगी या फिर एक अनुशासित पार्टी की तरह भाजपा के नेतागण व्यवहार करेंगे।

















