लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। वर्तमान में अखिल भारतवर्षीय ब्राह्मण महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं। ब्राह्मण कल्याण बोर्ड के गठन एवं ब्राह्मणों के हक के लिए अभियान चला रहे हैं। )
छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के यह सुविचार कम शब्दों में महत्वपूर्ण बात बतलाने के लिए काफी हैं। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की 16 अगस्त 2021 को तीसरी पुण्यतिथि है। 3 साल पहले 16 अगस्त के दिन यह महान शख्सियत हमेशा-हमेशा के लिए हम सभी से दूर हो गई थी। वह ऐसी जगह चले गए, जहां से कभी कोई लौटकर नहीं आता।

पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी का व्यक्तित्व एवं कृतित्व बेहद अलग था। उन्हें भला कौन भूल सकता है। पहली मुलाकात में वह दूसरे व्यक्ति को अपना बना लेते थे। सरल एवं मधुर व्यवहार के कारण वह विरोधियों को भी अपना बनाने की काबिलियत रखते थे। सही मायने में अटल विहारी वाजपेयी इस देश के अजात शत्रु नेता रहे। एक ऐसे इंसान जिनका कभी कोई शत्रु नहीं रहा। समूचे राजनीतिक जीवन में उन्हें किसी से दुश्मन नहीं माना। उनके जाने के बाद उनके जैसा नेता कोई नहीं बन पाया। निकट भविष्य में भी उनकी टक्कर का कोई नेता बनता नजर नहीं आता।मौजूदा परिस्थिति में हर राजनीति दल दूसरे को अपना दुश्मन मानता है। अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रतिद्वंदी बनाए, मगर कोई शत्रु कभी नहीं बनाया। वह आज हमारे बीच अथवा सदन में होते तो आज यह परिस्थितियां सदन में कभी उत्पन्न नहीं होती। उनकी बात को विरोधी भी सम्मान पूर्वक सुनते और मानते थे। अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री के रूप में 3 बार देश का नेतृत्व किया। इस दौरान उन्होंने अपने विचारों से हर किसी को प्रभावित किया। वे पहली बार साल 1996 में 16 मई से 1 जून तक, 19 मार्च 1998 से 26 अप्रैल 1999 तक और फिर 13 अक्तूबर 1999 से 22 मई 2004 तक देश के प्रधानमंत्री रहे। एक बार वाजपेयी पर विरोधी पार्टियों ने आरोप लगाया था कि उन्हें सत्ता का लोभ है। इस पर अटल जी ने लोक सभा में खुलकर बात की और अपने भाषण से सभी को चकित कर दिया था।

उन्होंने न सिर्फ विरोधियों को करारा जवाब दिया, बल्कि भगवान राम का श्लोक पढ़कर कहा था कि भगवान राम ने कहा था कि ‘मैं मरने से नहीं डरता, डरता हूं तो सिर्फ बदनामी से डरता हूं। इसके बाद विरोधियों ने कभी उन पर ऐसा आरोप नहीं लगाया। सदन में अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण को सुनने के लिए विपक्ष भी शांति से बैठा करता था। उनके भाषण हमेशा शानदार होते थे। वह अपनी बातों से गंभीरता से रखते थे। अटल जी का धैर्य भी काबिले तारिफ था। विपक्ष के आरोपों और हमलों पर वह एकाएक आक्रामक नहीं हो जाते थे। विरोधियों की बात को ध्यान से सुनने के बाद वह सटीक जबाव देकर विवादों को बढ़ने नहीं देते थे। पाकिस्तान को लेकर अटल बिहारी वाजपेयी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
पाकिस्तान के संदर्भ में उन्होंने कहा था कि आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं। उनका संकेत साफ था कि पाकिस्तान बेशक कितना बुरा क्यों न हो, मगर इस समस्या से निपटने के लिए निरंतर संघर्ष करना होगा। प्रधानमंत्री रहते समय अटल जी ने पाकिस्तान के साथ संबंधों को सुधारने की भरसक कोशिश की थी। हालाकि वह इस्लामाबाद की मानसिकता को बदल नहीं पाए थे। पाकिस्तान द्वारा कारगिल में घुसपैठ की घटना ने उन्हें भीतर तक परेशान कर दिया था। कारगिल युद्ध के दौरान का एक किस्सा बेहद प्रसिद्ध है। अमेरिका के उस समय के राष्ट्रपति ने एक बार देर रात में अटल जी को फोन कर सूचना दी थी कि पाकिस्तान गुपचुप तरीके से भारत पर परमाणु हमला करने की तैयारी कर रहा है। वाजपेयी ने अमेरिका के पूर्व राट्रपति की बात को धैर्यपूर्वक सुनने के बाद जबाव दिया था कि यदि इस्लामाबाद ने भूलकर भी इस तरह की गलती की थी इसके गंभीर परिणाम भुगतनें होंगे।

उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में साफ कह दिया था कि यदि भारत पर परमाणु हमला होता है तो पाकिस्तान का अस्तित्व समाप्त कर दिया जाएगा। यानी विषय परिस्थितियों में भी अटल बिहारी वाजपेयी ने संयम से काम लिया था। अटल जी के जीवन पर जितना लिखा जाए, कम होगा। वह बेशक आज हमारे बीच में नहीं हैं, मगर उनके विचार आज भी हमें बेहतर जीवन जीने और प्रतिकूल हालात से निपटने की प्रेरणा देते हैं। वाकई अटल जी जैसा कोई और होना संभव नहीं है। उनके विचारों को आत्मसात कर जीवन को खुशहाल बनाया जा सकता है। देश एवं समाज के उत्थान के लिए अटल बिहारी वाजपेयी ने अपना समूचा जीवन समर्पित कर दिया था। वह पहले ऐसे राजनेता हैं, जिन्हें आज भी विपक्षी दल सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।
















