जलवायु परिवर्तन : दुनिया पर मंडराता गंभीर संकट, कम नहीं चुनौतियां

लेखक- राकेश कुमार भट्ट

(लेखक सामाजिक विश्लेषक है। डेढ दशक से प्रकृति, पर्यावरण और मानव संसाधन प्रबंधन क्षेत्र से जुड़े हुए है और कई शोध पत्र तैयार किया है। इन विषयों पर अक्सर लिखते रहते है। यह लेख उदय भूमि के लिए लिखा है)

जलवायु परिवर्तन आज बेहद गंभीर चिंता का विषय बन गया है। जलवायु परिवर्तन का असर समूची दुनिया पर देखने को मिल रहा है। धरती का तापमान बढ़ने से विशालकाय ग्लेशियर पिघलने और टूटने की घटना आए दिन सामने आ रही है। बाढ़ एवं भूस्खलन की समस्या भी बढ़ रही है। दुनियाभर के वैज्ञानिक इस मुद्दे पर चिंता जाहिर कर रहे हैं। इसके बावजूद कोई ठोस रणनीति वैश्विक समुदायक नहीं बना पाया है। भविष्य में खतरा और बढ़ने की संभावना से इंकार नहीं किया जा रहा है। जलवायु परिवर्तन का असर भारत पर भी पड़ रहा है। अमेरिका की तरफ से कुछ दिन पहले नेशनल इंटेलिजेंस इस्टीमेट रिपोर्ट सामने आई है। यह रिपोर्ट भारत को भी आगाह कर रही है।

इस रिपोर्ट में भारत-पाकिस्तान और अफगानिस्तान सहित 11 मूल्कों को शामिल किया गया है। इन मूल्कों को जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से चिंताजनक श्रेणी में रखा गया है। नेशनल इंटेलिजेंस इस्टीमेट रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि भारत-पाकिस्तान व अफगानिस्तान सहित 11 देश जलवायु परिवर्तन के कारण दरपेश पर्यावरणीय एवं सामाजिक चुनौतियों से निपटने की क्षमता के दृष्टिकोण से मजबूत नहीं हैं। यह महत्वपूर्ण  रिपोर्ट ऐसे वक्त पर सामने आई है जब भारत की देवभूमि उत्तराखंड में निरंतर बारिश के कारण बाढ़ और भूस्खलन की समस्या चल रही है। अलबत्ता सामने खड़ी इन चुनौतियों से मुंह मोड़ने की बजाए आवश्यक तैयारियों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। नेशनल इंटेलिजेंस इस्टीमेट रिपोर्ट यह भी बताती है कि निकट भविष्य में वैश्विक तापमान की दशा तय करने में चीन और भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रहने वाली है। दरअसल चीन दुनिया का सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है। इस मामले में भारत चौथे नंबर पर है, मगर चीन के साथ जुड़ इसलिए जाता है चूंकि इन दोनों ही देशों में उत्सर्जन की मात्रा साल-दर-साल बढ़ रही है।

अमेरिका दूसरे और यूरोपियन यूनियन (ईयू) तीसरे स्थान पर हैं, मगर यह दोनों देश अपना उत्सर्जन कम करने के प्रति खासे गंभीर दिखाई दे रहे हैं। जानकारों का यह भी मानना है कि भारत जैसे देशों के लिए उत्सर्जन कम करना आसान काम नहीं है। इसके लिए सबसे बड़ा कारक जो जिम्मेदार है, वह है कोयले का बहुतायत में इस्तेमाल होना, जिसे इतनी जल्दी कम करना संभव नजर नहीं आता। कोयले के विकल्प तो मौजूद हैं, मगर सभी विकल्प अपेक्षाकृत काफी महंगे हैं। दूसरी बात यह है कि आज भी यह सेक्टर व्यापक पैमाने पर जरूरतमंदों को रोजगार उपलब्ध करा रहा है। ऐसे में कोई भी बदलाव धीरे-धीरे किया जाना संभव है। इसके अतिरिक्त इन बदलावों के आर्थिक पहलुओं की भी उपेक्षा नहीं हो सकती है। अमेरिकी रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि इन बदलावों का व्यय उठाने के सवाल पर विकासशील और विकसित देशों के मध्य कूटनीतिक खींचतान जारी रहने वाली है। खासकर इसलिए भी कि विकसित देश पेरिस समझौते के अनुरूप 2020 से वार्षिक 100 अरब डॉलर जुटाने में सफल नहीं हो पाए हैं, जिससे विकासशील देशों के लिए नेशनली डिटरमिंड कंट्रीब्यूशन (एनडीसी) गोल यानी उत्सर्जन कम करने से जुड़ी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता पूर्ण कर पाना मुश्किल हो रहा है। अलबत्ता विभिन्न देशों के दायित्व निर्धारित कर भी इस बात का ख्याल रखना आवश्यक है कि पर्यावरण संबंधी चुनौतियां अब बेहद गंभीर रूप ले चुकी हैं। इन चुनौतियों को पूर्णत: राष्ट्रीय चश्मे से देखना खुद के पांव पर कुल्हाड़ी मारना जैसा है। इसके प्रभाव विश्वव्यापी हैं और दोष चाहे किसी भी देश के सिर पर मढ़ा जाए, इसका नुकसान समूची दुनिया को भुगतना पड़ेगा। इसलिए बेवजह की खींचतान में उलझने से बचना होगा और आम राय से कोई सही रास्ता निकालने पर ध्यान देना चाहिए।

पेरिस जलवायु समझौते का मकसद वैश्विक औसत तापमान वृद्धि को 2 डिग्री से नीचे तक सीमित करना है। अब तक प्रस्तुत जलवायु योजनाओं के अध्य्यन से मालूम पड़ता है कि वास्तव में कार्बन उत्सर्जन 2030 तक 16 प्रतिशत बढ़ने के लिए निर्धारित है, जिससे औद्योगिक क्रांति से पहले के तापमान की तुलना में 2.7 सेंटीग्रेड तापमान (टेंपरेचर) बढ़ सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि तब से दुनिया पहले ही 1.1 डिग्री गर्म हो चुकी है। यदि पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्य को पाप्त करना है तो 2030 तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में 45 प्रतिशत की कटौती करने की जरूरत है। इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की हालिया रिपोर्ट ने यह चेतावनी दी है कि तापमान में वृद्धि के कारण पृथ्वी की कुछ जलवायु प्रणालियां पहले से ही खतरनाक तौर पर असंतुलित हो चुकी हैं।

ग्लास्गो में आगामी प्रमुख जलवायु शिखर सम्मेलन, सीओपी-26 से पहले उम्मीद की जा रही है कि जिन देशों ने अभी तक अपनी योजनाओं का विवरण नहीं दिया है वे दे देंगे। इसे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान के रूप में जाना जाता है। ऐसे में अब दुनिया भर की नजरें भारत पर टिकी हैं। अपने पहले एनडीसी में भारत ने वर्ष-2005 के अपने कार्बन उत्सर्जन स्तर को 2030 तक 33-35 फीसद तक कम करने की प्रतिबद्धता जताई थी। भारत का दावा है कि वह इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा, मगर वैज्ञानिकों का कहना है कि विभिन्न देशों ने पहले एनडीसी में जो वादे किए हैं और पेरिस समझौते को पूरा करने के लिए जो आवश्यक शर्तें हैं, उनमें बड़ा अंतर है। ऐसे में कार्बन-कटौती की प्रतिबद्धता को और बढ़ाने की जरूरत है, मगर भारत यह तर्क देता रहा है कि उससे विकसित देशों की तरह कार्बन-कटौती करने की संभावना नहीं की जानी चाहिए क्योंकि यह अभी विकासशील देश है। साथ गरीबी से गंभीरता पूर्वक लड़ रहा है। जीवाश्म ईंधन पर उसकी निर्भरता भी काफी ज्यादा है। कुल मिलाकर दुनियाभर पर मंडराते चिंताजनक संकट को दूर करने के लिए सभी को एकजुट होकर संघर्ष करना होगा।