भारत का चीन को फिर सख्त संदेश

चीन की नीति और नियत में कोई बदलाव नहीं आ सका है। विस्तारवाद नीति अपनाने और पड़ोसी देशों की भूमि पर एकाधिकार जताने के चक्कर में वह अक्सर विरोध व कटु आलोचना का सामना करता है। इसके बावजूद खुद में बदलाव लाने को तैयार नहीं है। चीन को एक बार फिर भारत ने खरी-खरी सुनाकर अपनी मंशा से अवगत करा दिया है। ड्रैगन को भारत ने सख्त संदेश दे डाला है। भारत ने साफ कर दिया है कि इस पड़ोसी राष्ट्र को किसी गलत-फहमी में नहीं रहना चाहिए। भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के इस ताजा बयान के मायने भी बेहद खास हैं। विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा है कि चीन को द्विपक्षीय संबंधों को लेकर भारत की स्थिति के संबंध में किसी प्रकार का कोई शक-आशंका नहीं होनी चाहिए।

ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमिक फोरम में ‘वृहद सत्ता प्रतिस्पर्धा : उभरती हुई विश्व व्यवस्था’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में एक सवाल के जवाब में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जो कहा, वह चीन के कड़ा संदेश माना जा रहा है। दरअसल भारत और चीन के संबंध इस समय सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं। इसका कारण खुद चीन है। बीजिंग ने समझौतों का अनुपालन न कर कुछ ऐसी गतिविधियां की हैं, जिनके पीछे उसके पास अब तक विश्वसनीय जबाव नहीं है। द्विपक्षीय संबंधों को वह किस तरफ ले जाना चाहते हैं, इसका जबाव भी चीन के नेतृत्व ने नहीं दिया है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर की कई बार बातचीत हो चुकी है।

बातचीत के दौरान हर बार भारत ने चीन के साथ संबंधों की बेहतरी पर जोर दिया है, मगर ड्रैगन कहता कुछ है और करता कुछ और है। इस कारण वह अपनी विश्वसनीयता को भी खो बैठा है। चीन के साथ पूर्वी लद्दाख में सीमा पर गतिरोध बरकरार है। बहरहाल भारत ने पुन: चीन को यह संदेश दे डाला है कि वह प्रत्येक परिस्थिति का सामना करने और उससे भली-भांति निपटने को तैयार है। वर्तमान रूस, चीन और पाकिस्तान का गठजोड़ किसी से छुपा नहीं है। अमेरिका से भारत की नजदीकी को ना चीन पचा पा रहा है और न रूस। रूस और भारत के संबंधों में पहले के मुकाबले कुछ नरमी देखी जा रही है। जबकि भारत के साथ चीन ने बेवजह का सीमा विवाद उत्पन्न कर रखा है।

इस विवाद को निपटाने में बीजिंग की कोई दिलचस्पी नहीं है। विश्व बिरादरी को भ्रमित करने के लिए वह गलत तथ्य पेश कर भारत के खिलाफ खुद को इक्कीस साबित करने की हरसंभव कोशिश कर रहा है, मगर इसमें उसे कामयाबी नहीं मिल रही है। सैन्य और कुटनीतिक दोनों स्तर पर बीजिंग को बार-बार भारत के हाथों मुंह की खानी पड़ रही है। चीन की गलत नीतियों का एक और ताजा मामला सामने आ चुका है। वह संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में सैन्य अड्डा स्थापित करने की जुगत में लगा है। यूएई में बीजिंग द्वारा सैन्य अड्डा बनाए जाने से अमेरिका की चिंता जरूर बढ़ गई है। अमेरिका ने इसका विरोध शुरू कर दिया है।

बाइडन प्रशासन अब संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पर अबू धाबी के पास चीनी बंदरगाह प्रोजेक्ट पर निर्माण कार्य को रोकने के लिए दबाव बना रहा है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट ने चीन के कृत्य का खुलासा किया गया है। रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका खुफिया एजेंसियों ने खलीफा पोर्ट पर भव्य इमारत के निर्माण के लिए गड्ढों की खुदाई किए जाने का पता लगाया है। यह स्थल अबू धाबी के उत्तर में है। जहां चीन के शिपिंग समूह ने विशालकाय व्यवसायिक कंटेनर टर्मिनल बनाया है। इस टर्मिनल का संचालन भी आरंभ हो चुका है। अमेरिका को इस बात की चिंता है कि चीन व्यापार सौदों और वैक्सीन कूटनीति के जरिए वैश्विक प्रभाव प्राप्त करने के अपने मकसद के अंतर्गत तेल संपन्न देश में सैन्य उपस्थिति स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।

इसके अलावा भारत की भूमि को कब्जाने की चीन की चाल को कुछ दिन पहले संयुक्त राज्य अमेरिका की रक्षा विभाग की महत्वपूर्ण रिपोर्ट ने उजागर किया था। रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर जारी तनाव से चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने विश्वस्तरीय व सामरिक अनुभव किया है। एलएसी पर अपने दावे को बनाए रखने के लिए चीन तेज गति से निर्माण कार्य करा रहा है। इसके तहत बीजिंग ने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र और अरुणाचल प्रदेश के बीच विवादित क्षेत्र के भीतर गांव तक बसा दिया है। इस गांव में सौ आवास का निर्माण कराया गया है। यानी चीन बाज नहीं आ सका है।

भारत के खिलाफ वह नए-नए हथकंडे अपना रहा है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब तक सत्ता में रहे, तब तक उन्होंने चीन को हमेशा करार जबाव दिया था। ट्रंप ने बीजिंग के खिलाफ कई तरह के प्रतिबंध तक लगा दिए थे। अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बाद बीजिंग को राहत मिलने की उम्मीद थी, मगर बीजिंग की नीतियों को जानने के बाद अब बाइडेन प्रशासन भी काफी सतर्क हो चुका है। बाइडेन प्रशासन बेहद फूंक-फूंक कर कदम उठा रहा है। उधर, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पिछले दिनों पूर्वी लद्दाख क्षेत्र का दौरा किया था।

उस दौरान रक्षा मंत्री ने भी चीन को कड़ा संदेश देने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। उन्होंने सैन्य जवानों का हौसला भी बढ़ाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी समय-समय पर बीजिंग को लेकर सख्त रूख दिखाते रहे हैं। इसके बाद भी चीन की नीतियों में सुधार न आना चिंताजनक है। जानकारों का मानना है कि वह अपनी मुश्किलें खुद बढ़ाने पर आमादा है। भविष्य में उसे इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है।